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उत्तम संयज धर्म पर दिए प्रवचन : उन्नति का सोपान संयम-धर्म महान – आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी


पर्युषण महापर्व पर आयोजित श्रावक संयम संस्कार शिविर में दिगम्बर जैनाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने संबोधन करते हुए कहा कि मनुष्य-भव, उच्च-कुल, विवेक, बुद्धि, निरोगता, आत्म-कल्याण की भावना, सद् गुरु, सदोपदेश संयम धारण, आत्मोन्मुखी दृष्टि जीवन में बहुत दुर्लभ है। समुद्र में पडा रत्न पुनः मिलना सम्भव है। परन्तु पुनः नर तन मिलना अत्यंत कठिन है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


नांदणी मठ (महाराष्ट्र)। पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित श्रावक संयम संस्कार शिविर में दिगम्बर जैनाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने संबोधन करते हुए कहा कि मनुष्य-भव, उच्च-कुल, विवेक, बुद्धि, निरोगता, आत्म-कल्याण की भावना, सद् गुरु, सदोपदेश संयम धारण, आत्मोन्मुखी दृष्टि जीवन में बहुत दुर्लभ है। समुद्र में पडा रत्न पुनः मिलना सम्भव है। परन्तु पुनः नर तन मिलना अत्यंत कठिन है। स्वर्ग के देव भी मनुष्य पर्याय प्राप्त करने लिए तरसते हैं। मनुष्य-भव मिलना बहुत दुर्लभ है। जैसे वाहन में ब्रेक, नदि में तट, गाड़ी में नट, सागर में सीमा, अश्व में लगाम, हाथी को अंकुश ऊंट में नकील घर में द्वार खेत में बाढ़ की जेब में नोट की, पेट में भोजन की, चुनाव में बोटकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन में संयम की आवश्यकता होती है।

संयम में सुख है, संयम में आनन्द है। संयम में शान्ति है। संयमी का यश लोक- अलोक में फैलता है। राग ही द्वेष को जन्म देता है। राग आग है, राग पाप का मूल है। राग अंधा है। राग विनाशकारी है। राग अनर्थ की जड़ है। राग कष्टकारी है। पर-से राग और द्वेष ही संसार भ्रमण का कारण है। असंयम राग से ही प्रारम्भ होता है। राग की एक कणिका साधक की सम्पूर्ण-साधना को क्षण भर में नष्ट कर देती है। असंयमित जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी के समान खतरनाक है।

असंयम से शरीर की शक्ति नष्ट होती है, बुद्धि का हास होता है सुन्दरता नष्ट होती है, रूग्नता बढ़ती है, अपयश होता है, पुण्य घटता है, पाप बढ़ता है। संयम सुख का रास्ता है। संयमी का यश बढ़ता है, संयमी स्वस्थ एवं सुन्दर रहता है, संयमी सर्वत्र सम्मान को प्राप्त करता है। संयमी क्षण मात्र में सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है। प्राणियों की रक्षा करना प्राणी संयम है, इन्द्रियों के भोगों से विरक्त होना इन्द्रिय-संयम है। संयम सुखद है। संयम सुक्ति का साधन है। संयमी की सर्वोन्नति होती है। संयम सज्जनों का श्रृंगार है। संयम सज्जनों की कुल- परम्परा है। असंयम छोड़ो, संयम धारण करो।

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