दो दिवसीय दंपति सेमिनार का समापन रविवार की बेला में हुआ। यह सेमिनार आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हुआ। इस सेमिनार में बाहर से आए वक्ताओं ने गृहस्थी धर्म में सामंजस्य के साथ संस्कार एवं आपसी मेलजोल के विषय में सभी को समझाया। रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर…
रामगंजमंडी। दो दिवसीय दंपति सेमिनार का समापन रविवार की बेला में हुआ। यह सेमिनार आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हुआ। इस सेमिनार में बाहर से आए वक्ताओं ने गृहस्थी धर्म में सामंजस्य के साथ संस्कार एवं आपसी मेलजोल के विषय में सभी को समझाया। इसी के साथ आचार्य श्री के संघस्थ मुनि श्री प्रत्यक्ष सागरजी महाराज, मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज ने भी अपनी वाणी से सभी को सफल दांपत्य जीवन के लिए उत्तम सीख दी। साथ ही सभी को आचार्य श्री से भी मोटिवेशन मिला। इस सेमिनार में 130 से अधिक युगलों ने भाग लिया।
सच्चे प्रेम में प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं
रविवार की बेला में दोपहर के सत्र में बाहर से आए वक्ताओं ने धर्म और गृहस्थी के संबंधों को मजबूत बनाने पर जोर दिया। दंपति शब्द के विषय में प्रकाश डाला और बताया कि विचारों में चिंतन होना चाहिए। वैमनस्य नहीं होना चाहिए, तब जाकर दंपति कहलाने के हम अधिकारी हैं। चार पुरुषार्थों के विषय में भी समझाया। यह भी समझाया कि विवाह एक संस्कार है और विवाह संस्कार के पुरोधा भगवान ऋषभदेव है। विवाह एक विचार है संस्कार है। इस विषय पर भी चिंता व्यक्त की गई कि समाज की संस्कृति अगर बिगड़ रही है तो विजातीय विवाह के कारण बिगड़ रही है। घर में माता-पिता का सम्मान नहीं है तो वह आदर्श घर नहीं हो सकता। यह बात भी दोहराई गई। दांपत्य जीवन में दिखावा नहीं होना चाहिए। सच्चे प्रेम में प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है।
समझदारी से प्रतिकूलता को अनुकूलता बनाएं
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में कोई भी व्यक्ति मांग से मुक्त नहीं हो सकता। व्यक्ति को सारी कला आनी चाहिए और मोक्ष जाने की कला भी आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में 100ः लोग समझदार हैं लेकिन, 99.9 प्रतिशत लोगों को समझदारी का प्रयोग करना नहीं आता। जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि समझदारी के अलावा कुछ भी नहीं है। यह समझदारी भी होना चाहिए कि प्रतिकूलता आ जाए तो मैं अनुकूलता बनाऊंगा। यह समझदारी है यदि हम ऐसे समय में समझदारी का प्रयोग करते है तो हम आसानी से समस्या से निकल सकते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में सुनने की क्षमता होनी चाहिए। जिसमें सुनने की ताकत होती है उसे क्रोध नहीं आता।
उस दिशा में चलें जिस दिशा में रुचि हो
संस्कारों के विषय में उन्होंने कहा कि जो कुछ भी आपके जीवन में अच्छा हुआ है। वह संस्कारों के कारण है और वह सब संस्कारों का खजाना है। ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। ज्यादा सोचने की आदत अच्छी नहीं होती। ज्यादा सोचेंगे तो परेशान होंगे। उन्होंने कहा कि उस दिशा में चलें जिस दिशा में आपको रुचि है और उसी की गहराई में जाएंगे तो बहुत कुछ कर पाएंगे। इसके संबंध में हम कुछ नहीं कर सकते। इसकी गहराई में यदि हम जाएंगे तो हम कुछ नहीं पा सकते।
समझदारी इसी में है कि स्वयं का मालिक बनो
जैन धर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन धर्म की शुरुआत होती है कि हम अपने ही मालिक हैं दूसरे के नहीं। जो व्यक्ति जागा हुआ है उसे ही जगाना चाहिए। यदि सोते को जगाओगे तो उसे क्रोध ही आएगा। उन्होंने कहा जरूरत नहीं है। धन कमाने और मकान और भगवान की भी नहीं है। जरूरत है समझदारी की यदि समझदारी आ जाती है तो इन चीजों की कोई जरूरत नहीं होगी। साथ ही गुरुदेव ने कहा कि परिवार, दुकान और घर कुछ भी चलाना हो तो समझदारी चाहिए। समझदारी इसी में है कि स्वयं का मालिक बनो। दूसरों का मालिक मत बनो। तुम अपने मालिक बनो और अपने अनुसार काम करो और भाव बनाओ। सीधे रोड चलते हैं और वास्तविकता चलते हैं तो हम बहुत कुछ पा सकते हैं। गुरुदेव ने कहा कि अगर हम अपने आप को समाधि तक पहुंचाएं तो यह सेमिनार की सार्थकता होगी।
परिवार में सबसे पहले भरोसा होना चाहिए
प्रातः बेला में मुनिश्री प्रत्यक्ष सागर जी महाराज ने जीवन में अहम और महत्वपूर्ण विवाह को बताया। गृहस्थ जीवन के दायित्व को बताते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन के दायित्व मुनियों से ज्यादा होते हैं क्योंकि, इसमें मां-बाप बच्चों और समाज से जुड़ना और समाज का अस्तित्व समझाना होता है। उन्होंने कहा कि परिवार में सबसे पहले भरोसा होना चाहिए। उन्होंने दांपत्य जीवन में सबसे कीमती मुस्कान को बताया कि जब आप तस्वीर खींचते हैं तो आप मुस्कुराते है। इस तरह जीवन में भी मुस्कुराओ।
जीवन में धर्म को भी साथ लेकर चले
प्रातः के सत्र में आचार्य श्री ने दांपत्य जीवन के विषय में काफी कुछ समझाया और कहा कि जैन दर्शन कहता है कि मर्यादाएं समाप्त नहीं होने चाहिए एवं धर्म को छोड़कर अगर दांपत्य जीवन को जिएंगे तो सुकून नहीं मिलेगा। परंपरा मर्यादा और अनुशासन का पालन होना चाहिए और परंपराओं को कायम रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म कहता है कि गृहस्थ को एक ओर नहीं झुकना चाहिए। दोनों पहियों को लेकर चलना चाहिए। यानी कि जीवन में धर्म को भी साथ लेकर चलना चाहिए। प्यार और प्रेम को भी गुरुजी ने समझाया। उन्होंने कहा कि प्यार में राग होता है और प्रेम में धर्म अनुराग होता है। साथ ही गुरुदेव सभी से प्रश्न किए और सभी से सेमिनार के अनुभव को समझा सभी को गुरुदेव ने मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया। इस अवसर पर समाज की ओर से सभी वक्ताओं का सम्मान किया गया।













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