धरियावद में पर्वराज पर्यूषण के आठवें दिन क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने धर्मसभा में त्याग धर्म की महिमा बताते हुए कहा कि त्याग से इंसान भगवान बन जाता है। उन्होंने शांति, दान और सदाचरण को जीवन की सच्ची संपत्ति बताया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
धरियावद, 4 सितंबर। पर्वराज पर्यूषण के आठवें दिन श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर परिसर में आयोजित धर्मसभा में दिगंबर जैन क्षुल्लक महोदय सागर जी महाराज ने त्याग धर्म की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति का प्रत्येक तत्व त्याग और परोपकार का संदेश देता है। वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां बहती हैं और बादल बरसते हैं, जबकि सागर नदियों का संग्रह कर भी खारा ही रहता है। इसलिए देना हमारी संस्कृति है और संग्रह करना विकृति।
महोदय सागर जी ने स्पष्ट किया कि भगवान महावीर ने त्याग को धर्म और भोग को अधर्म बताया है। जिस व्यक्ति के जीवन में भोगों की अधिकता रहती है, वह कभी भी शांति और संतोष प्राप्त नहीं कर पाता। महापुरुषों ने शांति की तलाश में राजमहलों का त्याग किया, जबकि आज लोग महलों की तलाश में शांति का त्याग कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सदाचरण हैवान को इंसान बना देता है और त्याग इंसान को भगवान बना देता है। मनुष्य दिन की शुरुआत में सोचता है कि पैसा ही जीवन है, लेकिन जब दिन का अंत होता है तो उसे लगता है कि शांति ही जीवन है।
पैरों की शोभा पायल से नहीं बल्कि तीर्थयात्रा से है
जीवन में दान की महिमा पर प्रकाश डालते हुए क्षुल्लक जी ने कहा कि कानों की शोभा कुंडल से नहीं बल्कि जिनवाणी श्रवण से है। आंखों की शोभा काजल से नहीं बल्कि जिनदर्शन से है। पैरों की शोभा पायल से नहीं बल्कि तीर्थयात्रा से है। जिव्हा की शोभा व्यर्थ बोलने से नहीं बल्कि प्रभु गुणगान से है। वैसे ही हाथों की वास्तविक शोभा सत्पात्र दान से होती है।धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और त्याग धर्म के इस गूढ़ संदेश को आत्मसात किया। वातावरण भक्ति, श्रद्धा और प्रेरणा से ओतप्रोत हो गया।













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