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उत्तम सत्य धर्म पर दिए प्रवचन : सत्य जीवन का श्रृंगार का है- आचार्य विशुद्ध सागर जी 


पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित “श्रावक संयम संस्कार शिविर” में सम्बोधन करते हुए आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि “सत्य धर्म है, सत्य सौन्दर्य है, सत्य श्रृंगार है, सत्य शिव है, सत्य सुन्दर है, सत्य मंगल है, सत्य उत्तम है, सत्य शरण है, सत्य व्रत है, सत्य महाव्रत है। सत्य सज्जनों का श्रृंगार है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट… 


नांदणी मठ (महाराष्ट्र)। पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित “श्रावक संयम संस्कार शिविर” में सम्बोधन करते हुए आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि “सत्य धर्म है, सत्य सौन्दर्य है, सत्य श्रृंगार है, सत्य शिव है, सत्य सुन्दर है, सत्य मंगल है, सत्य उत्तम है, सत्य शरण है, सत्य व्रत है, सत्य महाव्रत है। सत्य सज्जनों का श्रृंगार है। सत्य सज्जनों, कुलीन पुरुषों की कुल विद्या है। सत्य में शान्ति है, सत्य में आनन्द है, सत्य में सुख है, सत्य में यश है। सत्य में उमंग होती है। सत्य स्तुत्य होता है। सत्य वंदनीय है। सत्य धर्म का मूल है।असत्य अनर्थकारी है। असत्य अधर्म है। असत्य विनाशकारी है। असत्य हिंसक है।

असत्य अवनति का कारण है। असत्य दुःख-दाता है। असत्य अपयश का कारण है। असत्य अविश्वास को जन्म देता है। असत्य कुलहीनों की पहचान है। असत्य दण्डनीय है। असत्य पाप है। असत्य दुर्गति का कारण है। सत्य जानो, सत्य मानो सत्य स्वरूप में बोलना सीखो । सत्य ब्रह्म, सत्य प्राण, सत्य शून्य शब्द मृत, सत्य बोलना सत्य पर चलना, सत्य विचार वही है भविष्य का भगवान् । सत्यवादी का सर्वत्र सम्मान होना है। सत्यवादी सिद्धियों को शीघ्र ही साध लेता है। सैन्य संकट में आ सकता है, परन्तु सत्य की ही विजय होती है।

सत्य संयमियों का मूलगुण है। सत्य वह चक्र है जिसके बल पर सर्व-संकटों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। सत्य का जीवन जीने के लिए सत्य को जानना पड़ेगा। सत्य जाने बिना सत्य पूर्ण जी नहीं सकते। जीवन में अशांति असत्य से ही प्रारम्भ होती है। एक झूठ को छुपाने के लिए कषायी पाँचों पाप में प्रवृत्त हो जाता है। असत्य प्रकट न हो जाय, इसलिए व्यक्ति मायाचारी के साथ सैंकड़ों झूठ बोलकर भी बचना चाहता है।

झूठ वचन, झूठा दिखावा इंसान को हैवान बना देता है।सुख, शान्ति की चाह है, तो ढोंग का जीवन छोड़ो, ढंग से जीवन जीना प्रारम्भ करो। ढोंग का जीवन कृतिम फूल वत् होता है। झूठे दांगी घुने अन्न के समान होता है। दिखाना दिवाला निकाल देता है। असत्य से प्रारम्भ कार्य असफलता पर पूर्ण होता है।

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