धरियावद नगर के महावीर दिगंबर जैन मंदिर में क्षुल्लकश्री महोदय सागर जी एवं क्षुल्लकश्री पुण्योदय सागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में समाधिस्थ आर्यिका वत्सल मति माताजी के समाधिमरण पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसमें उनके जीवन में त्याग, तप, संयम, नियम का गुणानुवाद करते हुए मनुष्य जीवन की साथर्कता का विवेचन करते हुए विनयांजलि, श्रद्धांजलि अर्पित की गई। धरियावद से पढ़िए अशोक कुमार जेतावत की यह खबर…
धरियावद। दिगंबर जैनाचार्य वर्धमान सागर जी महाराज की शिष्या एवं संघस्थ आर्यिका वत्सल मति माताजी का गुरुवार शाम को टोंक नगर में सम्यक समाधिमरण हो गया। उनकी डोल यात्रा शुक्रवार प्रातः निकालकर जैन विधि-विधान अनुसार अंतिम संस्कार की क्रियाएं संपन्न हुईं। धरियावद नगर के महावीर दिगंबर जैन मंदिर में क्षुल्लकश्री महोदय सागर जी एवं क्षुल्लकश्री पुण्योदय सागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में समाधिस्थ आर्यिका वत्सल मति माताजी के समाधिमरण पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसमें उनके जीवन में त्याग, तप, संयम, नियम का गुणानुवाद करते हुए मनुष्य जीवन की साथर्कता का विवेचन करते हुए विनयांजलि, श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
72 वर्षीय आर्यिका वत्सल मति माताजी का जन्म सलूंबर में हुआ था। उनका विवाह धरियावद में होकर कर्मभूमि बना। उन्होंने भिंडर नगर में सन् 1997 फरवरी में वैराग्य को अपना कर जैनेश्वरी आर्यिका दीक्षा धारण की और संन्यास मार्ग को अपनाया। दीक्षा गुरु आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज ने आर्यिका वत्सल मति माताजी नाम दिया था। 28 वर्ष 9 माह के दीक्षा काल के बाद 6 नवंबर को टोंक में माताजी ने समाधि मरण को प्राप्त किया। माताजी ने अष्टान्हिका पर्व के 8 उपवास पूर्ण कर टोंक नगर में 5 नवंबर को चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए यम संल्लेखना व्रत धारण किया था।













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