समाचार

सत्य की पहचान के लिए जिनेंद्र भगवान का आलंबन जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने सत्य को सर्वव्यापक बताया


आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए सत्य के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें सत्य को जानना चाहिए। असत्य में केवल भ्रांति ही होगी और भ्रांति से कोई उपलब्धि नहीं होगी। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए सत्य के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें सत्य को जानना चाहिए। असत्य में केवल भ्रांति ही होगी और भ्रांति से कोई उपलब्धि नहीं होगी। उन्होंने कहा कि हम असत्य का समर्थन सबसे ज्यादा करते हैं। सत्य की पहचान भ्रांति को तोड़ने वाली होती है। सत्य की पहचान करने के लिए लौकिक व्यक्ति नहीं आध्यात्मिक व्यक्ति होना चाहिए। सत्य की पहचान जीवन में करना है तो जिनेंद्र भगवान का आलंबन लेना होगा। उन्होंने कहा कि इस भव का श्रृंगार सजावट सत्य पर होगा। यदि सत्य का श्रद्धान हो जाए तो हम सत्य की सार्थकता को सिद्ध कर सकते हैं। हमें भ्रांतियां को मानने की आदत हो गई है।

शरीर शरीर है आत्मा आत्मा है, यह आस्था पूर्वक निर्णय होता है तो सत्य का समर्थन होता है। जिस व्यक्ति का सत्य पर श्रद्धान होगा। वह व्यर्थ में आंसू नहीं बहाएगा। परिवार में मृत्यु दुख आदि में, क्योंकि वह द्रव्य और पर्याय को जानता है द्रव्य नित्य है और पर्याय अनित्य है क्योंकि, आना संयोग है और जाना वियोग है तो फिर रोने की जरूरत क्या है।

क्रिया से आज तक कोई धर्मात्मा नहीं हुआ 

आचार्य श्री ने कहा सुनने की शक्ति धर्मात्मा में होती है। यदि सुनने की शक्ति है तो वह धर्मात्मा है यदि सुनने की शक्ति नहीं है तो वह धर्मात्मा नहीं है। क्रिया में भाव होना चाहिए क्रिया कहीं जा रही है। भाव कही जा रहे हैं, हमें हमारे भाव एक जगह रखने की आदत नहीं बनी। जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय बोलते हुए जल समर्पित कर रहे हैं। भाव को पकड़ कर श्रद्धा के साथ भाव लो फिर जल चढ़ाओ। ऐसा करते हैं तो आप सत्य पर श्रद्धान कर रहे है। मंदिर में पूजन करने आए प्रवचन सुनने आए उलझ कर रह जाते हैं। हम संतवाद पंथवाद में उलझ रहे हैं। क्रिया को भाव के साथ करना चाहिए। बिना विश्वास और भाव के बिना कोई भी काम करेंगे तो लाभकारी नहीं होगा। जिनेंद्र भगवान ने जो कहा है वह सत्य है यही सम्यक दर्शन है।

बच्चों को भिखारी नहीं मालिक बनाओ 

आचार्य श्री ने कहा कि भगवान को तो मानते हैं लेकिन, उनकी कही हुई बात को मानते नहीं यदि ऐसा नहीं करते तो सम्यक दृष्टि नहीं हो। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बच्चों को भिखारी नहीं मालिक बनाओ आस्था भक्ति से उपलब्धि होगी मानने से नहीं। हमें जिस रास्ते पर चलना है हम उसे रास्ते को भूल जाते हैं आध्यात्मिक उपलब्धि क्षणिक दुख और बाद में सुख लौकिक उपलब्धि क्षणिक सुख लेकिन, बाद में दुख देती है। विश्वास जरूरी है विश्वास के बिना कोई काम नहीं हो सकते।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page