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ज्ञानार्जन के लिए विनयवान आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए: आचार्य कनकनंदी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार से दिया दिव्य प्रबोधन 


आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। भिलुड़ा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


भिलुड़ा । आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। अविवेकपूर्ण ज्ञान से धर्म को समझ नहीं सकते। सम्यक ज्ञान आत्मज्ञान के बिना स्वदोष को भी स्वीकार नहीं कर सकते। शांति प्राप्त करने के लिए स्वदोष को स्वीकार करना आवश्यक है। धर्म धार्मिक पुरुष के बिना नहीं रह सकता है। धार्मिक जन का अपमान करने वाला धर्म का अपमान करता है। समता धारी साधु का अपमान करने पर वह तो समता में रहते हैं कोई श्राप नहीं देते परंतु वह पुण्य लेकर चले जाते हैं। शांत वीतरागी साधु का अपमान करना सबसे बड़ा पाप है। सत्य से विपरीत बुद्धि होने से नारकी से भी महा पापी है। वह धर्म द्रोही धर्म का हिंसक है। धर्म के नाश होने पर सिद्धांत के को नष्ट होते देखकर बिना पूछे भी बोलना चाहिए।

 देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते

महाराज श्री ने कहा जिन पुरुष से धर्म की उत्पत्ति होती है धर्म की वृद्धि होती है वह धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं ऐसे साधु का अपमान करना धर्म की हिंसा है। महाराज श्री ने कहा जैन धर्म अहिंसक है कायर नहीं दबू नहीं। धार्मिक लोगों का अनादर करके प्रसन्न होने वाले पापी है। धर्म करके, दान देकर उसका पश्चाताप करने से पुण्य क्षीण हो जाता है। बिस लोड थ्योरी डॉ. एमएम बजाज की है। इसमें सिद्ध किया गया है कि जहां बूचड़खाने होते हैं वहां भूकंप, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ज्वालामुखी, सुनामी आदि प्राकृतिक प्रकोप आते हैं। महाराज श्री ने कहा मानव ही आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते हैं। मानव ही महामानव बनकर पंचम गति को प्राप्त कर सकता है। देवपर्याय में उत्कृष्ट देव की 33 सागर की आयु होने पर भी साधु भी नहीं बन सकते ना ही सिद्ध पद प्राप्त कर सकते हैं भले वहां से सिद्ध शिला की दूरी बहुत कम है। विद्या प्राप्त करके वाद विवाद नहीं करना चाहिए। कुभाव के कारण सत्य तथ्य को नहीं जान सकते।

ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए

आचार्यश्री ने कहा कि विद्यार्थी का प्राचीन नाम विनय है। जो विनय पूर्वक आकर आचार्य के पास अध्ययन करते हैं वह उपाध्याय है। पहले श्रद्धा होनी चाहिए श्रद्धा के बिना सम्यक ज्ञान नहीं होगा। स्वाध्याय का विवेचन,समीक्षा, समन्वय, मंथन होना चाहिए। किसी भी विषय को व्यवस्थित क्रमबद्ध संपादन करना विधान है। अनुष्ठान का अर्थ सम्यक आचरण करना। शिष्य को स्नान आदि से पवित्र होकर विनय से युक्त होकर शरीर की चंचलता से रहित होकर ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए। जिससे श्रेय सुख प्राप्त होगा। बच्चों की चंचलता को गलत नहीं मानना चाहिए यह उनके विकास के लिए बहुत अच्छा है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘क्या मैं हूं मानव, क्या मैं हूं तिर्यच, क्या मैं हूं नारकी, क्या मैं हूं देव इससे परे मैं हूं सच्चिदानंद’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी जैन ने दी।

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