आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ में चल रहा है। वैभव बडामलहारा जी ने बताया कि विरागोदय तीर्थ में आचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख और मुक्ति का स्थान है। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…
पथरिया। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ में चल रहा है। वैभव बडामलहारा जी ने बताया कि विरागोदय तीर्थ में आचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख और मुक्ति का स्थान है। त्याग प्रकृति का नियम है। त्याग श्रेष्ठ धर्म है। त्याग शांति का उपाय है। त्याग साधना है। त्याग में आनंद है। त्याग स्वर्ग का सोपान है। त्याग सिद्धि का साधन है। त्याग कर्म क्षय का हेतु है। त्याग सज्जनों की कुल विद्या है। त्याग मुक्ति का उपाय है। निर्वाण के लिए त्याग आवश्यक है।
त्याग दुःख से छूटने का उपाय है
उन्होंने कहा कि संपूर्ण मोह का त्याग करके मन-वचन-काय से निर्वेग-भावना को भाते हैं। उनको त्याग धर्म होता है। मिष्ट भोजन, राग-द्वेष को उत्पन्न करने वाले उपकरण तथा ममत्म-भाव को उत्पन्न होने में निमित्त वसतिका को छोड़ देता है। उसी त्यागी को त्याग धर्म होता है। त्याग दुःख से छूटने का उपाय है। जो सबकुछ त्याग देते हैं। वहीं परम शांति को प्राप्त कर सकता है। जितना-जितना त्याग होगा, उतनी उतनी पूज्यता प्राप्त होती है। दुःख के कारणों को शीघ्र छोड़ना भी त्याग है।
छोड़़ने से त्यागने से संकल्प-विकल्प कम होते है
त्याग श्रमणों की परंपरा है। त्याग से ही मोक्ष मार्ग प्रारंभ होता है। त्याग के बिना समाधि संभव नहीं है। आंतरिक भावों से छोड़ना ही त्याग है। जोड़़ने में कष्ट है। छोड़ने में आनंद है। छोड़़ने से त्यागने से संकल्प-विकल्प कम होते हैं। निराकुलता बढ़ती है। घोड़कर चाहना, महापाप है। मुनियों, तपस्वियों की साधना में सहायक आहार, औषध, ज्ञानाराधना हेतु शास्त्र लेखनी एवं ठहरने हेतु भवन में स्थान देना, इसे त्याग जानना।
त्याग पूर्वक दान देना चाहिए
ममत्व छोड़ना ही त्याग है। शक्ति अनुसार व्यक्ति को त्याग करना चाहिए। जिससे साधक की साधना बढ़े, तप में वृद्धि हो, परिणाम विशुद्ध हो, मोक्षमार्ग प्रशस्त हो, ऐसे आगमानुकूल साधन (उपकरण) श्रावक द्वारा साधुओं को उपलब्ध कराना चाहिए। स्व पर उपकार हेतु, स्वयं के द्रव्य को, यथायोग्य पात्र को स्व हस्त से देना दान है। विधि, द्रव्य, दाता, पात्र और दान में विशेषता से आती है। त्याग पूर्वक दान देना चाहिए। त्याग पूर्वक दिया गया दान ही भूषण बनता है। दान देते समय किसी प्रकार की आकांक्षा नहीं होना चाहिए। निःकांक्ष भक्ति, निःकांक्ष दान का फल ही सर्वश्रेष्ठ उत्तम होता है। दान देते समय भव्य जीनों को हर्ष होता है।













Add Comment