जैन धर्म में व्रत, उपवास और तप, तपस्या और संयम का गहरा महत्व है। व्यक्ति की जीवनधारा को बदलने का सामर्थ्य केवल व्रत और उपवास में ही है। कहने तो जैन धर्मानुरागी और प्रभु भक्त अपने स्तर पर श्रीजी की आराधना करते हैं, लेकिन जैन धर्मग्रंथों में कुछ व्रतों का बहुत महत्व बताया गया है। इंदौर से पढ़िए, यह विशेष खबर…
इंदौर। जैन धर्म में व्रत, उपवास और तप, तपस्या और संयम का गहरा महत्व है। व्यक्ति की जीवनधारा को बदलने का सामर्थ्य केवल व्रत और उपवास में ही है। कहने तो जैन धर्मानुरागी और प्रभु भक्त अपने स्तर पर श्रीजी की आराधना करते हैं, लेकिन जैन धर्मग्रंथों में कुछ व्रतों का बहुत महत्व बताया गया है। इनमें से एक रविव्रत (रविवार का व्रत) का बहुत महत्व है। यह व्रत विशेष रूप से धन, सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है और इसे करने से दरिद्रता दूर होती है और रोगों से मुक्ति मिलती है।
रविव्रत का महत्व
रविव्रत करने से दरिद्र व्यक्ति धन प्राप्त करता है। यह व्रत सुख और शांति प्रदान करता है। रविव्रत के प्रभाव से रोगों से छुटकारा मिलता है। मूर्ख व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है। वंध्या स्त्री को पुत्र की प्राप्ति होती है। कुछ जैन ग्रंथों में रविव्रत को मोक्ष का साधन भी बताया गया है।
रविव्रत की विधि
यह व्रत आषाढ़ शुक्ल पक्ष के अंतिम रविवार से शुरू होता है। श्रावण और भाद्रपद के 8-8 रविवारों को मिलाकर कुल 17 रविवारों का उपवास किया जाता है। यदि कोई 12 वर्ष तक इस व्रत का पालन करता है, तो उसे उत्तम गति प्राप्त होती है। व्रत के दौरान नमस्कार मंत्र का जाप करना चाहिए।
अन्य महत्वपूर्ण बातें
रविव्रत कथा के अनुसार मतिसागर सेठ ने इस व्रत का पालन करके दरिद्रता और दुखों से छुटकारा पाया था। यह व्रत जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए। यह व्रत पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान रूप से फलदायी है। जैन धर्म में रविवार व्रत को अति विशेष कहा गया है। इस व्रत को रवि व्रत या सूर्य व्रत भी कहा जाता है। जैन धर्म में इस व्रत को विधि-विधान से करने पर सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जैन रवि व्रत कथा
एक समय की बात है मतिसागर नाम का एक सेठ था जो बहुत गरीब था। वह हर रविवार को भगवान सूर्य की पूजा करता था और व्रत रखता था। एक बार उसने अपनी गरीबी दूर करने के लिए नौ वर्ष तक रवि व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत के प्रभाव से उसकी गरीबी दूर हो गई और वह धनी हो गया। उसके बाद उसने अपनी बेटी का विवाह एक गुणवान युवक से किया और बहुत दान-दक्षिणा दी। अंत में सेठ मतिसागर ने संन्यास लेकर मोक्ष प्राप्त भी किया।
व्रत विधि इस प्रकार है-
रविवार के दिन सूर्याेदय से पहले उठकर स्नान करें। घर के किसी पवित्र स्थान पर भगवान सूर्य की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। विधि-विधान से गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से भगवान सूर्य का पूजन करें। व्रत कथा सुनें या पढ़ें। भगवान सूर्य की आरती करें। व्रत का उद्यापन करें। जैन धर्म में रवि व्रत को नौ वर्ष तक या 12 वर्ष तक श्रद्धा और विधि-विधान से करने का विधान है, द जैन फाउंडेशन के अनुसार व्रत के दौरान ॐ ह्रीं सूर्याय नमः मंत्र का जाप करना फलदायी माना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति न केवल सांसारिक सुखों को प्राप्त करता है, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति भी कर सकता है। ‘यह विधि रविव्रत लियो, मतिसागर गुणगान। दुःख दरिद्र नशो सकल, अंत लहो निरवान’।।













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