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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव का नवां दिन : पापों को नष्ट करने के लिए बहुत ज्यादा ग्रंथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं है-मुनि पूज्य सागर


संविद नगर, कनाडिया रोड स्थित आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान का आयोजन नवें दिन किया गया। इस अवसर पर मुख्य पुण्यार्जक लक्ष्मीचंद्र जैन, मनीषा जैन, मनोज जैन, दीपा जैन और शौर्य जैन परिवार ने भक्तामर काव्य की 33, 34, 35, और 36 श्लोकों की आराधना करते हुए 224 अर्घ्य समर्पित किए। इस अवसर पर मुनि श्री प्रवचन भी हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। संविद नगर, कनाडिया रोड स्थित आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान का आयोजन नवें दिन किया गया। इस अवसर पर मुख्य पुण्यार्जक लक्ष्मीचंद्र जैन, मनीषा जैन, मनोज जैन, दीपा जैन और शौर्य जैन परिवार ने भक्तामर काव्य की 33, 34, 35, और 36 श्लोकों की आराधना करते हुए 224 अर्घ्य समर्पित किए।

अब तक इस आयोजन में कुल 2016 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस विशेष अवसर पर शान्तिधारा का लाभ निर्मल कासलीवाल छावनी परिवार को प्राप्त हुआ, जबकि दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का लाभ मुख्य पुण्यार्जक परिवार ने लिया। शास्त्र भेंट का लाभ सविता जैन विजयनगर और कमलेश विनोद जैन को मिला।

जन्मों के पापों का नाश
अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने भक्तामर काव्य के नौवें और दसवें श्लोक पर प्रवचन देते हुए कहा, “अरिहंत की स्तुति करना बहुत बड़ा कार्य है। आपके नाम का स्मरण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो मन में आपका नाम लेकर आपके गुणों का चिंतन करता है, उसके पाप भी समाप्त हो जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “पापों को नष्ट करने के लिए कितने ग्रंथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। पापों का नाश करने के लिए केवल अपने गुणों के प्रति श्रद्धा और आस्था होनी चाहिए।”

मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि अंजन चोर, जिसने आपका नाम लिया, वह आगाशगामिनी विद्या में सिद्ध हो गया। उनके अनुसार, “आपके नाम के स्मरण से मनुष्य को अनेक कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है। जो आपके प्रति भक्ति करता है, वह स्वयं आपके समान परमात्मा बन जाता है। प्रभु की भक्ति का फल सभी को समान रूप से मिलता है।”

भक्ति की दृढ़ता

मुनि श्री ने इस बात पर जोर दिया कि “भक्ति कभी कमजोर नहीं होनी चाहिए। यदि भक्ति कमजोर हो गई, तो हम परमात्मा नहीं बन सकते।” उन्होंने भक्तों को प्रेरित किया कि वे अपने आस्था और श्रद्धा को बनाए रखें, ताकि वे अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सकें।

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