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जिनभक्ति से बढ़कर संसार में अन्य कोई पुण्य नहीं मुनिश्री जयकीर्ति जी ने किया श्री जैन राम कथा का भाव पूर्ण प्रस्तुति करण           


विशिष्ट राम कथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनि श्री जयकीर्ति जी रामपुरा कोटा में विराजमान हैं। 30 नवंबर तक पद्मपुराण पर आधारित जैन श्रीराम कथा भक्ति भाव और श्रद्धा के साथ चल रही है। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर…


कोटा। विशिष्ट राम कथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनि श्री जयकीर्ति जी रामपुरा कोटा में विराजमान हैं। 30 नवंबर तक पद्मपुराण पर आधारित जैन श्रीराम कथा भक्ति भाव और श्रद्धा के साथ चल रही है। कथा के दूसरे दिन मुनिश्री को जिनवाणी भेंट करने का अवसर चांदमल विमलादेवी, महेश मीना प्रमोद वर्षा, डॉ. सुरभि, अवि, लक्ष्य, डॉ. भव्य गंगवाल परिवार गुलाबवाड़ी, प्रथम श्रोता राजा श्रेणिक ओम प्रकाश साधना, विकास नेहा, विश्वास अंजू पाटोदी गुलाबवाड़ी को मिला। अकलंक स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष पीयूष जैन ने बताया कि विशेष आकर्षण आज श्रीरामकथा के पूर्व अकलंक स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा गुरुदेव का पाद प्रक्षालन करना रहा। नन्हें बच्चों ने जब गुरुदेव का पाद प्रक्षालन किया तो सभी लोग भाव विभोर हो गए। कहते हैं बचपन में दिए गए सद् संस्कार जीवन में पचपन की दहलीज तक पहुंचने पर भी ज्यों कर त्यों बने रहते हैं। यह सार्वभौमिक सत्य है, इसे नाकारा नहीं जा सकता। मंगलाचरण पाठ परेश जैन ने किया। महेश गंगवाल ने बताया कि समाज के श्रेष्ठी जेके जैन, नरेश वेद, एमके जैन, प्रकाश पापड़ीवाल, भागचंद लोहड़िया, दीपचंद पहाड़िया, चेतन प्रकाश जैन, अनिल श्रीमाल, कैलाश जैसवाल, राहुल जैसवाल, गुलाबचंद लुहाड़िया, जंबू बडजात्या आदि गणमान्यों की उपस्थिति रही। इन्होंने द्वीप प्रज्वलन एवं गुरुदेव की फोटो का अनावरण किया।

भावविभोर करने वाले प्रसंगों को सुनकर भक्त विह्वल हो गए 

अति सुंदर शैली में मुनिश्री ने राम कथा का वाचन किया। आज कई सारे प्रसंग भाव विभोर कर देने वाले थे। वास्तव में प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम यूं ही नहीं कहते हैं। पिता द्वारा माता कैकेई को दिए गए वचन को पूर्ण करने के लिए पिता की आज्ञा को सर्वाेपरि मानते हुए राम का वन की ओर प्रस्थान किया। साथ में सीता और लक्ष्मण भी हठ करके चल पड़े। दशरथ का वैराग्य एवं दीक्षा का वर्णन, होनी को भला कौन टाल सकता है.। राह में अनेक विषम परिस्थितियों को पार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। राम से क्षण भी दूर नहीं रहने वाले भरत को राम के वियोग से अत्यंत दुःख हुआ। उनको भी संसार से वैराग्य हो गया.। किंतु धुती आचार्य के श्री मुख से गृहस्थ धर्म का महत्व सुनकर अणुव्रत धारण कर सद गृहस्थ बन गए। संसार में जितने भी जीव सिद्ध मुक्त हुए हैं वे सभी जिनधर्म की शरण में आकर ही हुए हैं।

मंगल द्रव्य दान की विशेष महिमा बतलाइ

मुनिश्री ने कहा कि जिनेंद्र भगवान की शरण ही अचिंत्य फलों को देने वाली है। उन्होंने जिन दर्शन, अष्ट द्रव्य से पूजन, अभिषेक की महिमा, चार प्रकार के दान, मंदिर में रंगोली, छत्र, चावर, दर्पण आदि मंगल द्रव्य दान की विशेष महिमा बतलाई। राजा वज्र कर्ण की जिनेंद्र भगवान के प्रति अटल श्रद्धा का विशद वर्णन किया। पारस जैन ने कहा कि जीवन में इस अविस्मरणीय रामकथा को अवश्य सुनें। देखे महापुरुषों के जीवन चरित्र सुनने से जीवन जीवंत हो जाता है। विपरित परिस्थितियों में दृढ़ता आती है। परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति अंतर्मन में पैदा हो जाती है। ऐसा दुर्लभ अवसर हाथ से नहीं जाने दें।

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