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धर्मसभा में दिए प्रवचन : आत्महत्या से बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता- मुनि श्री सुधासागर महाराज


यदि आपको कभी ऐसी अनुभूति हो कि पुण्यहीन हूं, मेरे से आगे कोई है, जब तुम्हें छोटेपन की अनुभूति हो कि मैं किसी से छोटा हूं, गरीब हूं, मैं बुद्धिहीन हूं, मेरी किस्मत ठीक नहीं है, तब उन व्यक्तियों के परिणाम उठते हैं- आपसे आगे जो पुण्यवान है, धनवान है, शक्तिमान है उसको देखकर आपको कैसा लग रहा है? यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


सागर। यदि आपको कभी ऐसी अनुभूति हो कि पुण्यहीन हूं, मेरे से आगे कोई है, जब तुम्हें छोटेपन की अनुभूति हो कि मैं किसी से छोटा हूं, गरीब हूं, मैं बुद्धिहीन हूं, मेरी किस्मत ठीक नहीं है, तब उन व्यक्तियों के परिणाम उठते हैं- आपसे आगे जो पुण्यवान है, धनवान है, शक्तिमान है उसको देखकर आपको कैसा लग रहा है? यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपनी किस्मत से असंतुष्ट है, सबसे ज्यादा दुनिया में यदि कोई परेशान है तो अपने भाग्य से, अपनी किस्मत से संतोष नहीं है, अपनी जिंदगी से परेशान है।

दूसरों से परेशान हो तो उसका रास्ता निकाला जा सकता है, तुम तो खुद अपनी जिंदगी से परेशान हो और जब तुम्हें खुद अपनी जिंदगी भार बनने लग जाये, सावधान तुम्हारे लिए लाइलाज बीमारी है, कोई उपाय नही दुनिया मे, कोई भी दुनिया की ताकत तुम्हारे भार को नहीं बांट सकती क्योंकि तुम्हें खुद अपनी जिंदगी भार बन गई।

 

भाव सही नहीं तो डूबने का समय समझो

मुनि श्री ने कहा कि जो धर्म से, संयम से, क्षमा, मार्दव भाव से, सरलता से ऊब गए है। सिर्फ क्षमा करना सही नहीं है, थोड़ा क्रोध भी करना चाहिए, ज्यादा विनयशील नहीं बनना थोड़ा अकड़ना भी ठीक है, ऊब गए विनय से। कभी ऐसा भाव आवे मुनि को भी, व्रती को भी तो समझ लेना ये डूबने का समय आ गया है। इन्द्रिय संयम से डूब रहा है, अरे इंद्रिय संयम जितना बने, वहां तो आनंद उछलना चाहिए, तू तो आनंद के स्थान पर ऊब रहा है। नासा दृष्टि का आनंद तो शास्त्रों में इतना कहा है कि सो इंद्र नाग नरेंद्र व अहमेंद्र के नाही कहो और इधर हम नासा दृष्टि से ऊब गए कि कहां तक झुकाऊं आंख। यदि स्वप्न में भी आ गया कि कितना सुनूं धर्म की बातें, समझ लेना डूबने का दिन आ गया।

मात्र वक्ता प्रामाणिक है 

उन्होंने कहा कि जो पूरी जिंदगी भर धर्म की बात सुने और सदा उनके आनंद बढ़ता जाए, कभी ऊबे नहीं, वे बनते हैं गणधर परमेष्ठी। जिनका उपयोग निरंतर ज्ञान मय बना रहता है, वो कहलाता है अभीक्षण ज्ञानोपयोगी। 24 घंटे जिनके उपयोग में ज्ञान की धारा बहती रहती है, जागरूक रहते हैं। पहली बार में ही संपूर्ण ज्ञान, गणधर परमेष्ठी को हो जाता है क्योंकि प्रथम ओंकार ध्वनि में पूरा द्वादशांग गर्भित है, अब पूरी जिंदगी भर क्या सुनते होंगे वो? एक हजार वर्ष कम एक लाख पूर्व कोटि तक वे आहार को नही गए कि उसी समय भगवान बोल गए तो प्रवचन छूट जाएगा, एक सेकेंड को भी कभी भगवान से विलग्न नहीं होते। यदि तुम जिनवाणी के श्रवण से ऊब गए गए हो तो समझ लेना तुम्हारी नैया डूबने वाली है। एक जगह श्वेतांबर साधु के द्वारा मांगलिक सुनने के लिए हजारों लोग जा रहे थे, मैंने कहा कि मंगल पाठ ये तो तुम्हें आता है, उन्होंने नहीं महाराज, मैं लाखों, अरबों, खरबों बार पढ़ लूं यही मंगल पाठ, यदि गुरु के मुख से सुना तो अनंत गुणा फल होता है और गुरु जो मुख से बोले उसको दुहराना, इसको बोलते है अभीक्षण ज्ञानोपयोग। महानुभाव वचनों की प्रामाणिकता नहीं है, वक्ता की प्रामाणिकता है। शब्द संख्यात है और अर्थ अनन्त है, एक भी शब्द प्रामाणिक नहीं है, मात्र वक्ता प्रामाणिक है उसके मुख से जो निकल जाये वह प्रामाणिक होता है। उसके मुख से जो निकले वही मंत्र है।

जिंदगी का सूरिमंत्र है णमोकार मंत्र

मुनि श्री ने कहा कि महाराज ऊंचे पद पर बैठकर के पापों से रहित होकर पंच पापों के त्यागी है फिर भी प्रतिक्रमण के समय स्वयं को पापी कहते है, यही इनकी सबसे बड़ी महानता है। जब भी कोई महान आत्मा अपने आप को निम्न कहे, नीचे बैठ जाये, महानुभाव समझ लेना संसार का सबसे बड़ा आदमी यही है। करोड़ो, अरबों बार णमोकार मंत्र पढ़ लेना और एक बार गुरु के मुख से पढ़ लेना, यह णमोकार मंत्र नहीं है, तुम्हारी जिंदगी का सूरिमंत्र है। 24 घंटे में सुबह भगवान की एनर्जी अलग होती है, दोपहर में अलग होती है शाम को अलग होती है, जब नित्य नियम वंदना करने जाओ तो भगवान का स्वरूप अलग होता है, बीच में जाओ तब अलग होता है, लेट लतीफ जाओ तो अलग होता है, दिन में तीन बार वन्दना क्यों? तीन बार मे तीन का स्वरूप मिलेगा तुझे। एक ही मूर्ति का ध्यान अलग-अलग होता है, भगवान का अशोक वृक्ष के नीचे ध्यान करो तो अलग एनर्जी निकलती है, सिंहासन युक्त भगवान का ध्यान करो तो नई एनर्जी निकलना शुरू हो जाएगी। छत्र युक्त अलग, चंवर सहित अलग एनर्जी मिलेगी। जो जिंदगी से इतना ऊब गया है कि सुसाइड करने का मन होने लगा, इसके लिए पद्मनन्दि रविषेणाचार्य कहते हैं अभी यह कितने भव तक अकाल से मरेगा, गर्भ में आएगा लेकिन इसका गर्भपात होगा, जिंदगी नहीं जी पायेगा अपर्याप्तक बनेगा। महानुभाव कभी जिंदगी में मरने का भाव मत करना, चाहे भली कोई तुम्हारी चमड़ी उधेड़ करके नमक मिर्ची भरकर के गर्म तेल की कढ़ाई में उबाल दे लेकिन मरने का भाव मत करना। आत्महत्या से बड़ा कोई पाप नही हो सकता।

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