हमारे मन में सहज ही यह भाव आ सकता हैं कि हमारे उठने-बैठने से शरीर पर या किसी को क्या फर्क पड़ सकता है। परंतु इसका हम गहराई से अध्ययन करें तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह तो एक जीवन जीने की कला के रूप में है। उठने-बैठने से तात्पर्य यह है कि शारीरिक रोगों पर भी उसका नियंत्रण करना है। वस्तुतः बैठने और उठने के भी वैज्ञानिक तरीके है जिन्हें हमें अपनाना ही नहीं चाहिए वरन् उसे हमारी दिनचर्या में सम्मिलित कर उसका पालन करना चाहिए। मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज का कॉलम Life Management निरंतरता लिए हुए है। पढ़िए इसके 16वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….
तीसरा सूत्र:-
कधं आसे – कैसे बैठें ?
जदं आसेे – यत्न पूर्वक बैठें।
बैठने और उठने के वैज्ञानिक तरीके हैं
बैठना-उठना भी एक व्यायाम है। प्रयत्नपूर्वक जो इस पद्धति को अपनाता है वह अनेक शारीरिक रोगों से आत्मा की रक्षा कर सकता है। कुत्ता भी जब बैठता हैं तो दुम हिलाकर जमीन साफ कर बैठता है, साधु अपने हाथ में मयूर पिच्छी इसी वास्ते रखते हैं। श्रावक गृहस्थ भी यदि सावधानी से उठे-बैठे तो जीवदया का पालन हो सकता है। आज आदमी कमर को आराम देने के लिए फोल्डिंग चेयर (Folding Chair) पर बैठता है। जिससे पीठ की रीढ़ में दर्द हो जाता है। बैठने का सही वैज्ञानिक तरीका है-सुखासन या पद्मासन में बैठते हुए रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी हो। समकोण की स्थिति बनें। ऐसी स्थिति में बैठने से प्राणवायु पेट के प्रत्येक अवयव तक पहुँचती है। जिससे लीवर, आँत आदि सुचारू रूप से काम करते हैं।
श्वास हर हाल में नाक से ही लें, मुख से नहीं
बैठने में जब श्वासोच्छवास का अवरोध होता है तो पीठ और पेट के अनेक रोग होते हैं। हमेशा ऐसी स्थिति में बैठें, जिससे दीर्घ श्वास लेने में दिक्कत न हो। श्वास नाभि तक पहुँचे। श्वास हर हाल में नाक से ही लें, मुख से नहीं। आगे की ओर अधिक झुककर पढ़ना, लिखना या कोई काम करना तथा पीछे टिककर बैठना ये दोनों ही दशाएँ स्वस्थ व्यक्ति को रूग्ण बना देती हैं। ‘नीतिवाक्यामृत‘ में लिखा है कि-‘अधिक बैठने वाले व्यक्ति की तोंद निकल आती हैं, बुद्धि स्थूल हो जाती है और वाणी की मधुरता चली जाती है।‘ सहसा न उठें, न बैठें। आज आमतौर पर व्यक्ति को कम्प्यूटर के सामने घंटों बैठना पड़ता है, जिससे आँखों पर भी असर पड़ता है। बहुत देर तक बैठने वाला काम चाहे ऑफिस का हो या दुकान का हो आधा घण्टे बाद शरीर को अवश्य हिलाएँ-डुलाएँ। श्वास को पेट में भर लें। आँखों को वहीं बैठे-बैठे इधर-उधर चलाएँ। बीच-बीच में 1-2 मिनिट की सावधानी लम्बे समय तक आपको बीमारी से दूर रख सकती है। आपका जीवन अनचाही बीमारी से बच सकता है।
ध्यान: चित्त की एकाग्रता का सबसे सरल-सहज उपाय है
सुखासन से बैठकर बांये हाथ (Left Hand) के ऊपर दायाँ हाथ (Right Hand) रखें। दोनों अंगूठों (Thumbs) को आपस में टच करें। इस तरह 15 से 20 मिनट तक बैठने का अभ्यास करें। आंखें बंद रखें। कुछ भी न सोचें। आंखों में जो संवेदन हो रहा है उस पर ध्यान दें। जैसे-जैसे 5 मिनट व्यतीत होंगे, आपका चित्त एकाग्र होगा। पूरे शरीर में रोग प्रतिरोधी ऊर्जा सिर से होकर प्रवेश करने लगेगी। इस ऊर्जा को ही कॉस्मिक एनर्जी कहते हैं। यह ऊर्जा इतनी सशक्त होती है कि आपके शरीर के रोगों को दूर करने के लिए ईश्वरीय शक्ति बन जाती है। यह कॉस्मिक एनर्जी (Cosmic Energy) लेजर रेज की तरह रोगों से लड़ती है। जितना ज्यादा आप स्थिर होंगे, हिलेंगे-डुलेंगे नहीं, यह ऊर्जा धीरे-धीरे पूरे शरीर में व्याप्त हो जाएगी। आपका मानसिक तनाव गायब हो जाएगा। आप नहाए हुए की तरह शक्ति से भरपूर महसूस करेंगे। प्रतिदिन इस तरह मेडिटेशन का अभ्यास अवश्य करें। यह बैठ कर किया गया ध्यान है और चित्त की एकाग्रता का सबसे सरल-सहज उपाय है। यही ध्यान मुद्रा है।
सुखासन से बैठकर मेडीटेशन करें
यदि आप दिनभर पैर लटकाकर कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं तो आप सुखासन से बैठकर इस तरह का मेडीटेशन अवश्य करें। दिनभर कुर्सी पर बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी पर विशेष असर पड़ता है, खास तौर से स्प्रिंग वाली कुर्सी पर बैठने से। ध्यान रखें बैठे-बैठे सहसा पीछे की ओर न मुड़े। इससे आपकी गर्दन में हमेशा के लिए दर्द हो सकता है। बैठे-बैठे किसी भारी वस्तु को न उठाएं। बैठे-बैठे अपने ऊपर अलमारी में रखी हुई किसी किताब आदि को न उठाएं। पहले खड़े हों फिर सावधानी से उस वस्तु को उठाएं।
ज्ञान मुद्रा का भी अभ्यास करें
रिलेक्सेशन के लिए पहले बताई हुई ध्यान मुद्रा का अभ्यास करें। कभी-कभी ज्ञान मुद्रा का भी अभ्यास करें। सुखासन से बैठे हुए अपने बांये हाथ को बांये घुटने पर और दांये हाथ को दांये घुटने पर रखें। अपनी तर्जनी अंगुली और अंगूठे को मिलाएं यह ज्ञान मुद्रा है। मस्तिष्क को शान्त और सक्रिय बनाए रखने के लिए यह मुद्रा अत्यन्त उपयोगी है। पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए यह मुद्रा ज्ञान वृद्धिकारक है। ऑफिस में या दुकान पर लम्बे समय तक काम करने वालों के लिए यह मुद्रा मानसिक थकान को दूर करके शान्ति प्रदान करती है।
ध्यानमुद्रा, ज्ञानमुद्रा और प्रार्थनामुद्रा ही सर्वग्राह्य हैं
मुद्रा तो बहुत प्रकार की हैं किन्तु संक्षेप से ध्यानमुद्रा, ज्ञानमुद्रा और प्रार्थनामुद्रा ही एक आम आदमी के लिए सर्वग्राह्य तथा पर्याप्त हैं। दोनों हाथ कमल की पांखुड़ी की तरह जोड़कर अपने हृदय को दच न करते हुए बैठना या खड़े होना प्रार्थना मुद्रा है। इस मुद्रा से की गई प्रार्थना आत्मविश्वास बढ़ाती है। सब तरह से लाइलाज होने पर प्रार्थना ही अन्तिम इलाज है।













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