वागड़ के महा अतिशयकारी तीर्थ क्षेत्र वागोल जी पार्श्वनाथ जैन मंदिर में बीते आठ अप्रैल की रात्रि में चोरों ने मंदिर जी से चांदी की 2 मूर्ति, अष्ट धातु की 4 मूर्ति, छत्र भमण्डल सिंहासन आदि कीमती सामान चोरी कर लिया है। इससे स्थानीय जैन समाज में रोष व्याप्त है। पढ़िए यह विस्तृत रिपोर्ट…
बांसवाड़ा। वागड़ के महा अतिशयकारी तीर्थ क्षेत्र वागोल जी पार्श्वनाथ जैन मंदिर में बीते आठ अप्रैल की रात्रि में चोरों ने मंदिर जी से चांदी की 2 मूर्ति, अष्ट धातु की 4 मूर्ति, छत्र भमण्डल सिंहासन आदि कीमती सामान चोरी कर लिया है। इससे स्थानीय जैन समाज में रोष व्याप्त है। मार्दव दोषी एवं अनुराग पंचोली ने आचार्य सुनील सागर महाराज को इस घटना की सूचना दी है। इस पर गुरुदेव ने शीघ्र प्रतिमा जी मिलने का आशीर्वाद प्रदान किया है और कहा है कि जब तक प्रतिमा न मिल जाए, तब तक णमोकार मंत्र के उल्टे जाप पढ़ना प्रारंभ करें।

गुरुवर के मार्गदर्शन में हुआ था जीर्णोद्धार
पूज्यवर राष्ट्र गौरव चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनीलसागर जी गुरुराज के मार्गदर्शन में प्राचीन वागोल पार्श्वनाथ जिनालय का अनुपम जीर्णोद्धार हुआ था। यहां भगवान की सात फणी मूर्ति विराजमान है।
भट्टारक सुमतकीर्ति ने थी स्थापित
श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र वागोल पार्श्वनाथ बीसपंथी मंदिर, वागोल-कुशलगढ़ (राज.) में स्थित है। यह क्षेत्र केशरियाजी से 150 किमी., नागफणी पार्श्वनाथ से 130 किमी. एवं अन्देश्वर पार्श्वनाथ से 20 किमी. दूर है। यह अतिशय क्षेत्र वागोल ग्राम में हिरन नदी के तट पर स्थित है। यह क्षेत्र राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं गुजरात राज्य की सीमाओं के नजदीक स्थित है जहां सम्पूर्ण भारत से जैन-जैनेतर यात्री तीर्थ के दर्शन हेतु आते हैं और दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं। भगवान वागोल पार्श्वनाथ की श्यामवर्ण चमत्कारी मूर्ति संवत् 1617 में भट्टारक सुमतकीर्ति द्वारा प्रतिष्ठित की गई थी। किंवदन्ती है कि भगवान वागोल पार्श्वनाथ का पाषाण कलशयुक्त मंदिर भट्टारक महाराज द्वारा आकाशगामिनी विद्या के बल से अन्यत्र स्थान से लाकर वागोल ग्राम में स्थापित किया गया। मूर्ति पर प्रशस्ति (लेख) अंकित है जिसके अनुसार संवत् 1617 में यह भट्टारक सुमतकीर्ति द्वारा प्रतिष्ठित की गई है। क्षेत्र का संचालन दिगम्बर जैन दशा हूमड़ पंच बीसपंथी समाज, कुशलगढ़ द्वारा किया जाता है।













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