दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 149वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय।
जो मेहंदी के पात में, लाली रखी न जाय॥”
कबीर इस दोहे में कहते हैं कि परमात्मा (साहिब) केवल मंदिरों, मस्जिदों या ग्रंथों में नहीं, बल्कि हर जीव के भीतर समाया हुआ है। जैसे मेहंदी के पत्ते में रंग छिपा होता है और पत्तों को पीसने पर वह लाली प्रकट होती है, वैसे ही हमारे भीतर छिपा ईश्वर भी साधना और भक्ति से प्रकट होता है।
हम अक्सर ईश्वर को बाहर खोजते हैं, परंतु कबीर समझाते हैं कि वह तो हमारे भीतर, हमारे हर श्वास, हर अनुभव में विद्यमान है। जब यह समझ आ जाती है कि हर प्राणी में ‘साहिब’ समाया है, तब अहंकार, भेदभाव, छुआछूत जैसी धारणाएं अपने आप मिटने लगती हैं।
यह दोहा न केवल ईश्वर की व्यापकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी प्रेरणा देता है कि हर इंसान के भीतर अपार शक्ति, दिव्यता और महानता छिपी है। जैसे मेहंदी पीसे बिना रंग नहीं देती, वैसे ही आत्मा की पहचान बिना साधना के संभव नहीं। ईश्वर हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर है — बस उसे देखने की दृष्टि चाहिए।













Add Comment