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तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथजी का ज्ञान कल्याणक 10 अक्टूबर को: तिथि के अनुसार भगवान संभवनाथ जी का ज्ञान कल्याणक कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाते हैं


जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथजी का ज्ञान कल्याणक 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान संभवनाथ जी का ज्ञान कल्याणक कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के ज्ञान कल्याणक महोत्सव को लेकर धार्मिक क्रियाओं का आयोजन किया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित साभार प्रस्तुति….


इंदौर। जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथजी का ज्ञान कल्याणक 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान संभवनाथ जी का ज्ञान कल्याणक कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के ज्ञान कल्याणक महोत्सव को लेकर धार्मिक क्रियाओं का आयोजन किया जाता है। भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, अष्ट द्रव्य सहित अन्य विधान विधि अनुसार किए जाएंगे। भगवान संभवनाथ जिन वर्तमान अवसर्पिणी काल के तीसरे तीर्थंकर थे। भगवान संभवनाथ जी ने सम्मेद शिखरजी में अपने समस्त घनघाती कर्माें का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया था और सिद्ध कहलाए थे। प्रभु का निर्वाण चैत्र सुदी 6 को हुआ था। भगवान संभवनाथ जी के प्रथम शिष्य का नाम चारूदत तथा प्रथम शिष्या का नाम श्यामा था। उल्लेखनीय है कि तीसरे तीर्थंकर भगवान श्री सम्भवनाथ जी की सबसे बड़ी प्रतिमा खड़की,अहमदाबाद में स्थित है।

भगवान संभवनाथ जी का सामान्य विवरण 

भगवान का अन्य नाम संभवनाथ जिन है और ऐतिहासिक काल 2× 10223 वर्ष पूर्व का है। इनसे पूर्व तीर्थंकर भगवान अजितनाथ तथा अगले तीर्थंकर अभिनंदननाथ थे।

भगवान का गृहस्थ जीवन 

भगवान संभवनाथ जी का इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय वंश में जन्म हुआ। पिता राजा जितारि तथा माताश्री सुसेना रानी हैं। भगवान के पंच कल्याणकों में गर्भ कल्याणक फाल्गुन शुक्लाष्टम्यां, जन्म कल्याणक कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा, दीक्षा कल्याणक मार्ग शीर्ष शुक्ल पूर्णिमा, ज्ञान कल्याणक कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल षष्टी को मनाया जाता है। भगवान संभवनाथ जी का च्यवन स्थान अघोग्रैवेयक से है। जन्म स्थान श्रावस्ती है तथा दीक्षा स्थान सहेतुक वन में श्रावस्ती नगर में है। भगवान को केवल ज्ञान सहेतुक वन में श्रावस्ती नगरी में मिला था। भगवान संभवनाथ जी का मोक्ष स्थान सम्मेद शिखर पर स्थित है। अश्व युद्धों में विजय दिलाता है, उसी प्रकार संयमित मन जीवन में विजय दिलवा सकता है। अश्व से हमें विनय, संयम, ज्ञान की शिक्षाएं मिलती हैं। यदि भगवान संभवनाथ के चरणों में मन लग जाए तो असंभव भी संभव हो सकता हैं। जैन शास्त्रों में कहा है- ‘मणो साहस्सिओ भीमो , दुटठस्सो परिधावइ ‘ मन दुष्ट अश्व की तरह बडा साहसी और तेज दौडने वाला है।

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