जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का गर्भकल्याणक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अनुष्ठान और विधान आदि किए जाते हैं। भगवान का अभिषेक और शांतिधारा के साथ ही अष्टद्रव्य अर्पित किए जाते हैं। इस बार भगवान संभवनाथ का गर्भ कल्याणक 24 फरवरी को है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक इस बार 24 फरवरी को मनाया जा रहा है। देश के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान संभवान जी के गर्भ कल्याणक सहित अन्य जानकारी से रूबरू होते हुए जानते है कि दिव्य जीवन रूप से संभवनाथ भगवान का गभधान हुआ और उनका जन्म भरत क्षेत्र में श्रावस्ती नगरी में राजा जितारी और रानी सेना देवी के घर हुआ था। जब भगवान संभवनाथ रानी सेना देवी के गर्भ में थे। तब उस साल राज्य में सांभा अर्थात मूंगफली की फसल खूब हुई थी। इसलिए उनका नामकरण संभवनाथ हुआ। पुराणों के अनुसार संभवनाथ जी का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ और उनका चिन्ह छोड़ा है। भगवान संभवनाथ जी ने अपनी देशना में अनित्य भावना के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला और उन्होंने बताया कि इस संसार में कौन सी जी चीज नित्य हैं और कौन सी अनित्य हैं। अनित्य का अर्थ है अस्थायी और नित्य का अर्थ है स्थायी। शास्त्रों का अध्ययन करते समय या सत्संग में केवल कुछ क्षणों के लिए हमें लगता है कि यह पूरी दुनिया अस्थायी है और केवल आत्मा ही स्थायी है। इसका कोई अर्थ नहीं है। इस बात को स्थायी रूप से समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन सी चीज स्थायी है और कौन सी अस्थयी है। हम इस दुनिया में अपनी पांच इंद्रियों से जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं। हमें यह जांचने की जरूरत है कि वह स्थायी या स्थायी।
भगवान संभवनाथ जी के गर्भकल्याण की संक्षिप्त जानकारी
तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को हुआ था। जब वे अधोग्रैवैयक विमान से चक्रव सृष्टि नगरी के राजा दृढ़ (जितारी) और माता सेनादेवी के गर्भ में आए थे। इस दौरान 56 कुमारियों ने सेवा और स्वर्ग से इंद्र ने ज्ञान का उल्लेख किया।
माता-पिता-रानी सेना और राजा जितारी (इक्ष्वाकु वंश, कश्यप गोत्र)।
नगर-श्रावस्ती.
गर्भ नक्षत्र- मृगशिरा नक्षत्र।
विशेषता-भगवान के गर्भ में आने से ही राज्य में सुख-समृद्धि बढ़ी। जिससे उनके नाम ‘संभव’ का अर्थ सार्थक हो गया। 56 दिग्कुमारी देवियों ने माता की सेवा की और सौधर्म इंद्र ने गर्भ कल्याणक मनाया।













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