दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 165वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“जेती देखो आत्म, तेता सालिगराम।
राधू प्रतखि देव है, नहीं पाथ सूं काम॥”
कबीर दास जी इस दोहे में स्पष्ट करते हैं कि जैसे सालिग्राम (शालिग्राम शिला) को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का प्रतीक मानकर पूजा जाता है, वैसे ही हर जीवात्मा में परमात्मा का वास है। यदि हम अपनी आत्मा को पहचान लें, तो समझना चाहिए कि हमने साक्षात ईश्वर को पा लिया है।
वे यह भी कहते हैं कि केवल पत्थर की पूजा करने से कुछ हासिल नहीं होगा, यदि हम अपने भीतर के ईश्वर को नहीं पहचानते। पत्थर मात्र एक माध्यम है, उसका महत्व तभी है जब वह हमें आत्मबोध और सच्चे ईश्वर-ज्ञान की ओर ले जाए।
आज मनुष्य के कर्म और व्यवहार में दया, सत्य और प्रेम की कमी दिखती है। कबीर का संदेश है — यदि हम हर जीव में ईश्वर को देखना सीख जाएं, तो न किसी से घृणा रहेगी और न अन्याय होगा।
असली भक्ति भीतर के ईश्वर को अनुभव करने में है। ईश्वर मंदिर में भी है और प्रत्येक जीव के हृदय में भी। बाहरी पूजा तभी सफल होती है जब भीतर की भक्ति सच्ची हो।
हम अक्सर बाहरी साधनों और प्रतीकों पर अधिक ध्यान देते हैं, जबकि असली शक्ति हमारे भीतर के विचारों, भावनाओं और चरित्र में है। जीवन की सच्ची प्रगति तभी है जब हम भीतर के ईश्वर को जगाएँ।
आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं। जिसने अपने भीतर की आत्मा को पहचान लिया, उसने परमात्मा को पा लिया। यही पहचान मोक्ष का मार्ग है।
कबीर की वाणी हमें चेताती है कि असली धर्म मानवता, करुणा और सत्य में है।
ईश्वर को मंदिर में ढूंढने से पहले हर जीव में देखो।













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