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आचार्य विद्यासागर जी का राष्ट्रप्रेम और मानवता संदेश : इंडिया नहीं, भारत बोलो का नारा दिया था विदिशा चातुर्मास से ही


 मुनि श्री संभवसागर ने प्रातःप्रवचन सभा में कहा कि इंडिया नहीं भारत कहो यह संदेश पूज्य गुरुदेव ने विदिशा चातुर्मास से ही दिया था। उन्होंने बताया कि 2014 के चातुर्मास में गुरुदेव ने एक बड़े चैनल को साक्षात्कार देते हुए कहा था कि यदि हम “भारत” को याद रखेंगे तो हमारी धर्म परंपराएं भी याद रहेंगी। पढ़िए यह राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट…


विदिशा। मुनि श्री संभवसागर ने प्रातःप्रवचन सभा में कहा कि इंडिया नहीं भारत कहो यह संदेश पूज्य गुरुदेव ने विदिशा चातुर्मास से ही दिया था। उन्होंने बताया कि 2014 के चातुर्मास में गुरुदेव ने एक बड़े चैनल को साक्षात्कार देते हुए कहा था कि यदि हम “भारत” को याद रखेंगे तो हमारी धर्म परंपराएं भी याद रहेंगी।

राष्ट्रीयता और धर्म का संदेश

मुनि श्री संभवसागर ने बताया कि पूज्य गुरुदेव का चिंतन हमेशा राष्ट्रहितों को ध्यान में रखकर चलता था। उनका मानना था कि राष्ट्र सुरक्षित है तभी सभी धर्म सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध गीतकार और संगीतकार रविन्द्र जैन ने गुरुदेव के प्रवचनों को सुनकर तत्काल विदिशा में ही गीत इंडिया नहीं भारत कहो, भारत कहो भाई की रचना की और उसका प्रथम गायन यहीं किया गया।

भारतीय चिकित्सा पद्धति और कोरोना काल

मुनि श्री ने कहा कि गुरुदेव ने न केवल नारा दिया, बल्कि समय-समय पर भारत के शीर्षस्थ नेताओं से भी इस विषय में चर्चा की और उनका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि अपने जीवन में हमें भारतीयता को अपनाना चाहिए और भारतीय चिकित्सा पद्धति का पालन करना चाहिए, जो कम से कम पांच हजार वर्षों से चली आ रही है। मुनि श्री ने यह भी बताया कि गुरुदेव ने 2019 में पूर्णायु अनुसंधान चिकित्सा केंद्र महाविद्यालय जबलपुर का शुभारंभ किया, जिसका लाभ कोरोना काल में संपूर्ण भारत ने ऑनलाइन औषधियों के माध्यम से उठाया। मुनि श्री ने कहा कि उस समय आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के पास कोविड-19 का कोई उपचार नहीं था, जबकि आयुर्वेद विशेषज्ञों के पास कारगर उपचार उपलब्ध थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रेवतीरेंज, इंदौर में हाईकोर्ट बेंच के जज और स्टाफ ने पूर्णायु की औषधियों का उपयोग किया और कोरोना से सुरक्षित होकर गुरुदेव का आभार प्रकट किया।

परिवार और कर्म सिद्धांत पर संदेश

मुनि श्री ने परिवार के वातावरण पर ध्यान देते हुए कहा कि कर्मों की साईकल हमेशा चलती रहती है। घर परिवार में यदि छोटी-छोटी बातों पर जलन और कुढ़न छोड़ दी जाए तो घर में होने वाली सास-बहु की झड़पें समाप्त हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि यह किसी एक घर की कहानी नहीं, बल्कि घर-घर की सामान्य समस्या है जिसे अनेकांत और कर्मसिद्धांत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है।

समता और सुख-दुख का पाठ

मुनि श्री ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए बताया कि इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं, यहाँ तक कि चक्रवर्तीओं की भी। उन्होंने अयोध्या नरेश भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि वह छह खंडों के अधिपति थे, लेकिन उनके छोटे भाई ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की। मुनि श्री ने समझाया कि जिसने समता का व्यवहारिक पाठ अपनाया, वह सुखी रहा, और जिसने नहीं अपनाया, वह कितने भी संसाधन जुटा ले, दुखी रहेगा। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने सुख और दुःख का लेखक स्वयं है, कोई दूसरा इसका लेखक नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वं किए गए कर्मों के फल सुभाषुभ निश्चित रूप से मिलते हैं।

विद्यालयों और छात्रों का सहभाग

प्रातःप्रवचन के पश्चात कई शासकीय और अशासकीय शिक्षण संस्थाओं से प्राध्यापक एवं प्राचार्य उपस्थित हुए। इस अवसर पर संजय पांडे ने अपने सभी साथियों के साथ गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया और बचन दिया कि वे “स्वर्ण प्राशन” को घर-घर पहुंचाने में अपना पूर्ण सहयोग देंगे।

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