आचार्य श्री प्रज्ञासागर महाराज के सानिध्य में कोटा से स्वास्तिधाम तक निकली जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा ने न केवल जिनशासन की प्रभावना दिखाई, बल्कि हरित क्रांति का संदेश भी दिया। इस भव्य पदयात्रा का मुख्य संयोजन मिथुन मित्तल और रामगंजमंडी नगर के युवा कार्यकर्ताओं ने किया। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…
रामगंजमंडी। परम पूज्य पर्यावरण संरक्षक एवं तपोभूमि प्रणेता आचार्य श्री प्रज्ञासागर महाराज के सानिध्य में कोटा से स्वास्तिधाम तक निकली जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा ने न केवल जिनशासन की प्रभावना दिखाई, बल्कि हरित क्रांति का संदेश भी दिया। इस भव्य पदयात्रा का मुख्य संयोजन मिथुन मित्तल और रामगंजमंडी नगर के युवा कार्यकर्ताओं ने किया।
अविस्मरणीय पदयात्रा का अनुभव
पदयात्रा के दौरान शामिल श्रद्धालुओं ने कहा कि यह एक ऐसा पल था जिसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे। पैदल चलने के बावजूद थकान महसूस नहीं हुई और भक्त भक्ति और नृत्य के माध्यम से यात्रा का आनंद लेते रहे। पदयात्रा में भोजन और आवास की व्यवस्थाएं किसी शादी समारोह जैसी की गईं। प्रत्येक रुकावट स्थल पर धर्मशाला के बजाय रिसोर्ट जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं।
गुरु और श्रद्धालुओं का दिव्य मिलन
पदयात्रा के दौरान गणिनी गुरु मां आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी स्वयं संघ सहित आचार्य श्री के स्वागत के लिए जहाजपुर कस्बे में उपस्थित हुईं। जगह-जगह स्वागत द्वार और तोरण द्वार से आगवानी की गई। भक्तों ने भक्ति में झूमते हुए गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया
स्वस्तिधाम तीर्थ पर महिला शक्ति ने मंगल कलश लेकर गुरुदेव का भव्य स्वागत किया। क्षेत्र समिति द्वारा भी ऐतिहासिक आगवानी की गई, जिसे स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।
जिनधर्म प्रभावना में आचार्य श्री का योगदान
गणिनी गुरु मा स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि जिनधर्म की प्रभावना में आचार्य श्री का बड़ा योगदान है। उन्होंने पुरानी स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि आचार्य श्री के मार्गदर्शन में भक्तों ने पदयात्रा में सहभागिता की और इस दिव्य आयोजन का आनंद लिया।
आचार्य श्री 108 प्रज्ञासागर महाराज ने कहा कि जो सरल होता है वह तरल होता है, और जो तरल होता है वह शुद्ध बहाव में होता है। उन्होंने प्रज्ञासागर नाम के महत्व को बताते हुए कहा कि साधना के द्वारा ऊँचाइयाँ छूना और अनुकरणीय बनना संभव है।
पदयात्रा का समापन
शनिवार की बेला में पदयात्रा का समापन हुआ। प्रातः श्रीजी का अभिषेक और शांतिधारा संपन्न हुई। इसके बाद आहारचर्या, दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरण और मंगलाचरण किया गया। पदयात्रा में विशेष सहयोग देने वाले भक्तों का सम्मान किया गया और आसपास के क्षेत्र से आए भक्तों ने गुरुवर से आशीर्वाद प्राप्त किया।
आचार्य श्री ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि श्रद्धालुओं ने जहाजपुर पदयात्रा में स्वर्ण कलश बनकर इसे पूर्णता प्रदान की है।













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