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इंदौर का पार्श्वनाथ भगवान का एकमात्र प्राचीनतम जिनालय: यहां का अतिशय ऐसा कि सब संकट होते हैं दूर 


दिगंबर जैन मंदिरों में भक्त, श्रद्धालुजन भगवान के दर्शन, पूजन, आराधना और भक्ति के लिए नित्य नियम से जाते हैं। कुछ मंदिर तो सिद्ध होते हैं तो कुछ मंदिर के अतिशय श्रद्धालुओं के संकट हरने वाले होते हैं। भगवान पार्श्वनाथ जी के मोक्षकल्याण अवसर पर हम शहर के एक ऐसे प्राचीन जिनालय की ओर ध्यान दिलाना चाह रहे हैं, जहां का अतिशय ऐसा कि भक्तों के सब संकट दूर हो जाते हैं। इंदौर से पढ़िए, हरिहरसिंह चौहान की यह विशेष प्रस्तुति…


इंदौर। दिगंबर जैन मंदिरों में भक्त, श्रद्धालुजन भगवान के दर्शन, पूजन, आराधना और भक्ति के लिए नित्य नियम से जाते हैं। कुछ मंदिर तो सिद्ध होते हैं तो कुछ मंदिर के अतिशय श्रद्धालुओं के संकट हरने वाले होते हैं। भगवान पार्श्वनाथ जी के मोक्षकल्याण अवसर पर हम शहर के एक ऐसे प्राचीन जिनालय की ओर ध्यान दिलाना चाह रहे हैं, जहां का अतिशय ऐसा कि भक्तों के सब संकट दूर हो जाते हैं। हम बात कर रहे हैं शहर के सबसे प्राचीन दिगंबर जैन जिनालयों में से एक दानवीर सर सेठ हुकुमचंद द्वारा निर्मित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, जो जबरी बाग नसिया जी में स्थित है। इस मंदिर में मूलनायक 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ प्रभु की मनोहारी और चमत्कारी प्रतिमा का अतिशय भक्तों के विश्वास से ही दिखाई देता है।

नसिया वाले पारस प्रभु के भक्त शहर में कहीं भी चले जाएं लेकिन, वह समय अनुकूल एक बार समय अनुरूप मंदिर जी में दर्शन करने अवश्य आते हैं। वहां अपनी खाली झोली लेकर आते हैं और झोली भर के जाते हैं। प्रतिमा के दर्शन से अंतरात्मा तृप्त हो जाती है। यह मंदिर 126 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर जबरी बाग नसिया जी में मुख्य रेलवे स्टेशन के पास ही स्थित है। इंदौर की इस प्राचीन मंदिरों की श्रृंखला में विशेष स्थान इस मंदिर का है।जो पूरे भारत के दिगंबर जैन समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण भी है। यहां बहुत शांति और सुकून मिलता है। वहां भक्त जो किस्मत वाले होते हैं वही जाते हैं। पारस प्रभु शरण में यूं ही नहीं हर कोई आ जाता है। 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी ने जो बहुत कष्टों को सहा और कमठ के मोह को भंग किया। तभी वहां हमारे लिए स्वर्ग के समान सुखों की लालिमा बनकर हमें आशीष देते हैं।

यहां तो चमत्कार को ही नमस्कार है

इंदौर शहर का सबसे प्राचीन मानस्तंभ भी है। जिसे दानवीर सर सेठ हुकुमचंद जी ने ही बनवाया था। इस मानस्तंभ में जिनबिम्ब की प्रतिमाएं विराजमान हैं। जिसका अभिषेक साल में एक बार करने की परंपरा आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य समाधिस्थ संत ऐलक श्री निशंक सागर जी ने रखी थी, जो निरंतर प्रवाह से अपने 19 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। मंदिर के मानस्तंभ का जीर्णाेद्धार समाधिस्थ संत ऐलक श्री निशंक सागर जी महाराज के करकमलों द्वारा ही किया गया था। उन्हीं के पुण्यों के उदय से मंदिर जी का अतिशय पूरे देश में व्याप्त है। जन-जन के संत समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज भी यहां दो बार आए। ऐसी परंपरा सी बन गई कि इंदौर में जो भी दिगंबर जैन साधु-संत, मुनि महाराज, आर्यिका माता जी जो भी आते हैं वह एक बार नसिया जी जरूर दर्शन करने आते हैं। यहां की मूल वेदी में चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा सभी के संकटों का निवारण करती है। जहां दूर-दूर से सभी समाजजन और भक्त पारस प्रभु के आशीष लेकर अपने जीवन में खुशियां से भर जाते हैं।

भगवान पार्श्वनाथ की वंदना 

ऐसे संकट मोचन पार्श्वनाथ भगवान की जय हो, नमोस्तु भगवान जी, दुखों के इस भंवर में मेरी नाव फंसी हुई है। आप ही पार लगाओगे हमारी आस्था भी तुम हो पारस प्रभु और विश्वास भी तुम ही हो क्योंकि तुमसे हमारी लगन लग गई है। तो अपनी शरण में ले लो प्रभु हम तो बालक है आप के, आप तो हम सब के अराध्य हो तो मेरी नाव जो बीच मझधार में घनघोर अंधकार में निकल ही नहीं रही, तो आप ही नसिया के पार्श्वनाथ भगवान, सहारा बन मुझे अपना बना लो। आज मुकुट सप्तमी पर आप के मोक्ष कल्याणक के महा महोत्सव पर आज आप के चरणों में नमोस्तु भगवान, बारम्बार नमोस्तु।

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