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प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 17 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को है 


शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में 17 जनवरी को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को इस कल्याणक को मनाए जाने का विधान है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह खास संकलित और संपादित रिपोर्ट…


इंदौर। शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में 17 जनवरी को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को इस कल्याणक को मनाए जाने का विधान है। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का मोक्ष कल्याणक जैन धर्म के पांच प्रमुख कल्याणकों में से अंतिम हैं, जो माघ कृष्ण चतुर्दशी (हिंदू कैलेंडर के अनुसार) को मनाया जाता है। जहां वे कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर शरीर और कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध (मोक्ष) हुए थे। जिससे उनकी आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गई। यह दिन जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि, यह संसार से मुक्ति और शाश्वत शांति का प्रतीक है। जहां भगवान ने हजारों वर्षों तक तपस्या के बाद यह परम पद प्राप्त किया था। जैन धर्म आगमों के अनुसार मोक्ष कल्याणक में तीर्थंकर शरीर, कर्म आदि से मुक्त होकर सिद्ध हो जाते हैं और उनका पुनः संसार में आवागमन नहीं होता है। मनुष्य जीवन के लिए संसार से मुक्ति सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि होती है। मोक्ष कल्याणक के माध्यम से भगवान आदिनाथ ने हजारों वर्ष पूर्व आज ही के दिन मोक्ष पद प्राप्त किया था। इस दिन को दिगंबर जैन मंदिर में अभिषेक, परिमार्जन व शांतिधारा के कार्यक्रम किए जाते हैं। साथ ही निर्वाण लाडु चढ़ाकर दिव्य आराधना कर भगवान आदिनाथ की भक्ति की जाती है। जैन समाज में भगवान आदिनाथ जी का यह कल्याणक विशेष तौर पर बहुत अहम है।

मोक्ष कल्याण के बारे में प्रमुख बातें

तिथि- माघ कृष्ण चतुर्दशी (माघ मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि)।

स्थान- कैलाश पर्वत, जिसे अष्टापद के नाम से भी जाना जाता है, भगवान आदिनाथ की मोक्ष भूमि है।

महत्व- इस दिन, भगवान आदिनाथ ने सभी कर्मों (अघाति-कर्म) का नाश कर दिया और आत्मा को अनंत जन्म-मरण के बंधन से मुक्त किया, जिससे वे सिद्धलोक में विराजमान हो गए।

परंपरा- इस अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, निर्वाण लड्डू चढ़ाए जाते हैं और सत्संग व शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जो इस महान उपलब्धि का उत्सव मनाते हैं।

विशेष- प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने मानव सभ्यता को कृषि, व्यापार, कला, लेखन और राजनीति जैसे ज्ञान देकर समाज को दिशा दी और फिर तपस्या के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त किया, जो सभी के लिए प्रेरणादायक है।

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