समाचार

उत्तम आकिंचन्य धर्म पर दिए प्रवचन : पर-पदार्थ मेरा नहीं है- आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज

नांदणी मठ। पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित ” आध्यात्मिक श्रावक संयम-साधना संस्कार शिविर” में शताब्दी देशनाचार्य अध्यात्मयोगी आचार्य रत्न श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने कहा कि पर-पदार्थ (धन, सम्पत्ति, धरती, भवन, वस्त्रादि) कुछ भी मेरा नहीं है। आत्म द्रव्य भिन्न है, शरीर भिन्न है। तन भी भी मेरा नहीं है। ध्रुवधाम टंकोत्कीर्ण भगवानात्मा से संसार के सर्व-पदार्थ अत्यंत भिन्न हैं। मैं पर का नहीं, पर मेरे नहीं। मैं अकेला था, अकेला हूं और हमेशा अकेला ही रहूंगा। मुझमें पर नहीं, पर में मैं नहीं। मैं पर का नहीं, पर मेरे नहीं।

मैं पर-से परिपूर्ण भिन्न हूं, पर मेरे से अत्यन्त भिन्न हैं। कभी भी पर मेरे नहीं होंगे, मैं पर का नहीं होऊंगा। मैं आकिंचन्य स्वरूप हूं। मैं ब्रह्म स्वरूप हूं। मैं गैकालिक शुद्ध-बुद्ध सिद्ध-स्वरूपी हूं। मुझमें कर्म नहीं, सुझमें राग-द्वेष मोह परिणाम नहीं। मुझमें आकांक्षा नहीं, मुझमें कष्ट पीड़ा नहीं। मैं दर्शन – ज्ञान स्वभावी चैतन्य-भगवान्- आत्मा हूँ। मैं मैं हूँ पर का मुझमें मिश्रण नहीं, मैं किसी का कर्ता नहीं, यही है परम- आनन्द स्वरूप आकिंचन्य-धर्म ।

” न किंचनम् इति आकिंचन”

किंचित् ‌मण मेरा कुछ नहीं, मैं पर का नहीं, यही है आकिंचन्य-धर्म ।।

सर्वप्रथम क्रोध को छोड़ा क्षमाधर्म, प्रकट किया, पश्चात् मान, माया, लोभ कषाय को छोड़ा फलतः मार्दव, आर्जव शौच धर्म प्रकट किया। सत्य स्वीकार किया। तप-संयम धारण किया, फिर वस्तु स्वरूप को समझकर बाह्य- अंतरंग परिग्रह को त्याग दिया। क्षमा, मार्दव, आर्जव शौच सत्य, संयम, तप, त्याग के उपरान्त प्रकट होता है परमानन्द- स्वरूप ‘आकिंचन्यधर्म ।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page