मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा में उद्बोधन देते हुए कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है। दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है। अपने दोषों को छिपा सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दे सकता। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
विदिशा। मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा में उद्बोधन देते हुए कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है। दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है। अपने दोषों को छिपा सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि कर्म का सिद्धांत एआई सुपर कंप्यूटर की तरह है। जिसकी कोडिंग पूर्णतः निष्पक्ष है। उसमें हमारे प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म निरंतर दर्ज होते रहते हैं। कर्म का लेख न मिटता है, न बदलता है और न ही किसी मुखौटे से प्रभावित होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुकान, घर या समाज की नजरों से आप अपने आपको छिपा सकते हैं, लेकिन कर्म से अपने आपको नहीं छुपा सकते। उन्होंने कहा कि बाहर के पाप को आप प्रभु और गुरु के सामने प्रायश्चित करके कम कर सकते है, परंतु धर्म क्षेत्र में, मंदिर में या पवित्र भावों के मध्य की गई असावधानी कर्म लेख में अमिट रूप से अंकित हो जाती है। दूसरों को धोखा दिया जा सकता है पर आत्मा और प्रकृति की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दिया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा कि जीवन में सजगता, संयम और सत्यनिष्ठा अत्यंत आवश्यक है, कर्मों की “कोडिंग” व्यक्तिगत होती है। अतः भीतर से तथा बाहर से सावधान रहने की आवश्यकता है,जिसने जो किया है, उसका फल उसी को भोगना पड़ेगा।
बुरा लगना ही उपचार की शुरुआत
उन्होंने लोकप्रसिद्ध उक्ति उद्धृत करते हुए कहा कि कोई लाख करे चतुराई, कर्म का लेखा मिटे न भाई। गुरु वाणी के संदर्भ में मुनि श्री ने कहा कि गुरु की वाणी कभी-कभी कड़वी दवा के समान प्रतीत होती है पर उसका उद्देश्य आत्मिक स्वास्थ्य को ठीक करना होता है। जैसे कड़वी दवा रोग को जड़ से समाप्त करती है और काँटा निकालते समय क्षणिक पीड़ा होती है पर बाद में राहत मिलती है वैसे ही गुरु की कठोर लगने वाली बातें हमारे भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कांटों को निकालने के लिए होती हैं। बुरा लगना ही उपचार की शुरुआत है। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने कहा कि यदि हम मन पर जमे कुसंस्कारों को बार-बार दोहराते रहेंगे तो आत्मा कभी निर्मल नहीं हो पाएगी। चौरासी लाख योनियों के चक्र के पश्चात यह मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभता से मिला है। यदि अब भी नहीं संभले तो पुनः उसी चक्र में भटकना पड़ेगा।
धर्म एक कदम आगे बढ़ाता है
उन्होंने कहा कि जितनी बड़ी दुकान, उतना बड़ा फायदा या उतना ही बड़ा नुकसान। धर्म का अवसर जितना बड़ा है, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यदि उत्तम विचारों की लीक नहीं पकड़ी, मन को संयम और साधना में स्थिर नहीं रखा तो पतन भी उतना ही गहरा होगा। धर्म एक कदम आगे बढ़ाता है तो अधर्म सौ कदम पीछे धकेल देता है।
दीक्षा काल के प्रसंग साझा करते हुए मुनि श्री ने बताया कि गुरुदेव जब सैकड़ों किलोमीटर दूर विहार का संकेत देते थे, तब प्रारंभ में मन में अनेक प्रश्न उठते थे। किंतु समय बीतने पर परिणाम देखकर समझ आता था कि गुरु का निर्णय कितना दूरदर्शी और जनकल्याणकारी था।
गुरु जो कहें, आदेश का उल्लंघन मत करो
गुरु का निर्णय व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और निष्पक्ष भावना से प्रेरित होता है। उन्होंने कहा, गुरु जो कहें, उनके आदेश का उल्लंघन मत करो। यदि यह मंत्र अपना लिया तो जीवन आनंदमय हो जाएगा। अंत में उन्होंने कहा कि कठिनाइयां जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, पर जिनकी श्रद्धा अटल है और जिनकी आशा गुरु पर टिकी है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री के आध्यात्मिक प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.45 बजे से आयोजित हो रहे हैं।













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