दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 150वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“परबति परबति में फिराया, नैन गवाई रोई।
सो बूटी पाऊं नहीं, जाते जीवनी जीवनि होइ॥”
इस दोहे में संत कबीर एक साधक की पीड़ा, भटकन और आत्मिक संघर्ष को उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि seeker (साधक) पर्वत से पर्वत, तीर्थ से तीर्थ, स्थान-स्थान घूमता है, रोता है, आंखें थका देता है — लेकिन फिर भी उसे वह “बूटी” नहीं मिलती जो जीवन को सच्चा अर्थ और दिशा दे।
यह “बूटी” प्रतीक है उस आत्मज्ञान, सत्यदर्शन और ईश्वर के अनुभव का, जो हमारे भीतर छिपा है। कबीर साफ कहते हैं कि बाह्य यात्रा (तीर्थाटन, पूजा, अनुष्ठान) तब तक अधूरी है, जब तक भीतर की यात्रा शुरू नहीं होती।
आज का मनुष्य भी उसी भ्रम में उलझा है — वह सच्चा सुख और शांति सोशल मीडिया, उपभोग, प्रतिष्ठा, फैशन और बाहरी दिखावे में खोजता है। उसे लगता है कि कोई बाहरी उपलब्धि या अनुभव उसकी अधूरी पहचान को पूर्ण कर देगा। लेकिन कबीर याद दिलाते हैं कि वह जीवन को जीवन बनाने वाली बूटी कहीं बाहर नहीं — हमारे भीतर, हमारी आत्मा के केंद्र में है।
जब तक व्यक्ति अपने अंतर्मन में नहीं झांकता, आत्मनिरीक्षण नहीं करता, तब तक जीवन की सच्ची अर्थवत्ता नहीं मिल सकती।
परमात्मा को पाने के लिए दुनिया घूमने की नहीं, अपने भीतर उतरने की ज़रूरत है।













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