श्रुत पंचमी का ज्ञानामृत पर्व 31 मई को मनाया जाएगा। इस दिन विविध कार्यक्रमों के साथ शास्त्रों का अध्ययन, पाठन और पूजन आदि किए जाएंगे। श्रुत पंचमी पर्व जैन धर्म में महापर्वों की श्रेणी में आता है। जैन धर्म एक ऐसा अनादिनिधन धर्म है, जिसमें सर्वाधिक पर्व आते हैं। जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन का यह विशेष आलेख…
जयपुर। श्रुत पंचमी पर्व जैन धर्म में महापर्वों की श्रेणी में आता है। जैन धर्म एक ऐसा अनादिनिधन धर्म है, जिसमें सर्वाधिक पर्व आते हैं। ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है, जिसमें 250 से अधिक पर्व और महापर्व आते हों, एकमात्र जैन धर्म है। जिसमें वर्ष में 250 से अधिक पर्व व महापर्व आते हैं। जैन धर्म में सच्चे-देव शास्त्र-गुरु की पूजा आराधना होती है, सच्चे देव यानि हमारे तीर्थंकर भगवन्त जिन्होंने सभी प्रकार के कर्मों का क्षय कर ष्मोक्षष् पद प्राप्त किया और तीर्थकर प्रकृति का बन्ध प्राप्त कर जन्म लिया। सच्चे शास्त्र यानि आगम प्रमाण, तीर्थकरों की वाणी जो आज हमें पढ़ने को मिलती हैं। सच्चे गुरू यानि निर्गन्थ सच्चे वीतरागी, मूलाचार आगम के अनुसार जिनकी चर्या है, ऐसे देव-शास्त्र-गुरू की पूजा की जाती है। आज वर्तमान पीढ़ी को इन पर्व व महापर्वों के बारे में ज्ञान होना अति आवश्यक है इन पर्वों में एक महान व अनूठा पर्व है श्रुत पंचमी, जो प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को सम्पूर्ण जैन समाज मनाता है इस पर्व में शास्त्र, जिनवाणी यानि ज्ञान की पूजा होती है। हम सबको श्रुत पंचमी के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। ज्ञान होगा तभी हम इस महापर्व को मनाएंगे।
683 वर्ष तक श्रुत परंपरा यानि सुनने की परम्परा चली आ रही थी
यह पर्व प्राकृत भाषा पर्व भी कहते हैं, और ज्ञानामृत पर्व भी कहते हैं। अब हम इस महापर्व के बारे में जानकारी लेना चाहते है। जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है इसमें तीर्थकर भगवंत होते हैं, जो हर काल में 24-24 होते हैं तीर्थकर भूतकाल के हो चुके हैं, भविष्य में भी 24 तीर्थकर होगे, यह आगम प्रमाण है यानि केवली, तीर्थकर भगवन्तों की वाणी है। वर्तमान में 24 तीर्थकर हुए हैं, वर्तमान काल चल रहा है जिसमें अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी हुए हैं, और प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं, और इस प्रकार हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं जिन्होंने मानव जगत को रहन-सहन की विभिन्न कलायें सिखाई। अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के पश्चात 683 वर्ष तक श्रुत परंपरा यानि सुनने की परम्परा चली आ रही थी यानि भगवान महावीर स्वामी की वाणी गुरू-शिष्य परम्परा से प्रभावित होती रही। भगवान को जब केवलज्ञान की प्राप्ति हो गयी तब इंद्रों ने (कुबेर, सौधर्म इंद्र) समवशरण की रचना की, भगवान का समवशरण यानि धर्मसभा लगती है, तब उनकी दिव्य ध्वनि अनेकों भाषाओं में ओमकार रूप में खिरती है। जिसे गणधर भगवंत सुनते हैं, ग्रहण करते हैं, शब्द रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सच्चे आगम, सच्चे शास्त्र है।
जिनवाणी यानि जिन आगम को कैसे सुरक्षित रखा जाए ?
श्रुत परंपरा भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद कुछ वर्षों तक रही। जैनाचार्यों ने जब यह अनुभव किया कि शिष्य वर्ग की स्मरण शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है। जिनवाणी यानि जिन आगम को कैसे सुरक्षित रखा जाए। यदि इसको सुरक्षित नहीं किया गया तो जिनागम, जिनवाणी समाप्त हो जाएगी। अतः इस परंपरा को शताब्दियों तक अबाध रूप से करने के लिए लिपिबद्ध होना अति आवश्यक है। भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात 3 अनुरुद्ध केवली हुए, इन्द्रभूति गणधर को केवलज्ञान हुआ। 12 वर्ष पश्चात सुधर्माचार्य जी को केवलज्ञान हुआ। तत्पश्चात 12 वर्ष बाद अनुबद्ध केवली जम्बू स्वामी हुए। जिन्होंने मथुरा चौरासी (उत्तरप्रदेश) से निर्वाण प्राप्त किया। इसके बाद श्रुत केवली विष्णु कुमार, श्री नन्दिमित्र, श्री अपराजित जी, श्री गोवर्धन जी, एवं अंतिम श्रुत केवली श्री भद्रबाह जी थे आचार्य पूर्व द्वादशांग के ज्ञाता श्रुत केवली हुए। तदन्तर ग्यारह अंग और दश पूर्वों के नेता विशाखाचार्य जी, प्रोष्ठिनजी, क्षत्रिय जी ,जयनाग जी, सिद्धार्य जी, धृति सेन जो, विजय जी, बुद्धिल जी, गंगदेव जी और धर्मसेन जी आचार्य हुए तत्पश्चात नक्षत्र जी, जयपाल जी, पाण्डु जी, ध्रुवसेन जी, कंस जी ये 5 आचार्य ग्यारह अंगों के धारक हुए। तदन्तर सुभद्र जी, यशोभद्र जी, यशोबाहु जी ओर लोहार्य जी ये चार आचार्य जी एक मात्र आचरंग के धारक हुए।
शिष्यों का नाम भूतिवली और पुष्पदंत रखा गया
इसके पश्चात अंग और पूर्व वेत्ताओं की परंपरा समाम हो गई। और सभी अंगों और पूर्वों के एक देश का ज्ञान आचार्य परम्परा से धरसेनाचार्य जी को प्राप्त हुआ। धरसेनाचार्य जी गिरनार पर्वत की गुफा में रहते हुए, उनके मन में श्रुत संरक्षण का विचार आया और उन्होंने निमित्त ज्ञान से अपनी अल्पायु जानकर श्रुत की रक्षार्य महिमानगरी में एकत्रित मुनिसंघ के पास एक संदेश भेजा, मुनि संघ ने उस संदेश की पालना में, दो मुनियों को गिरनार भेज दिया, श्री धरसेनाचार्य जी ने उन मुनियों की विद्यामंत्र देकर परीक्षा ली। एक मुनि को एक अक्षर अधिक और एक को एक अक्षर कम वाला विद्या मंत्र देकर परीक्षा ली और उपवास सहित साधने को कहा। उन्होंने साधना की उन मंत्रो में त्रुटि का आभास हुआ और सही कर पुनः साधना की और साधना पूर्ण कर आचार्य श्री को उनकी सुपात्रता का आभास हो गया। उन्हें अपना शिष्य बनाकर उसको सैद्धान्तिक देशना दी और उन शिष्यों का नाम भूतिवली और पुष्पदंत रखा गया।
वेदनाखण्ड, वर्गणा खण्ड, महाबन्ध यानि षट्खण्डागम ग्रन्थ की रचना हुई
आचार्य श्री पुष्पदंत जी महाराज ने जिनवाणी का लेखन प्रारंभ किया, और 5 खण्ड सूत्र रूप में लिखे, दूसरे शिष्य भूतवली जी ने छठा खण्ड विस्तार से लिखा इस प्रकार छः खण्ड छः हजार श्लोक प्रमाण छः खण्ड यथा जीव स्थान, क्षुद्रकबंध, बन्ध स्वामित्व, वेदनाखण्ड, वर्गणा खण्ड, महाबन्ध यानि षट्खण्डागम ग्रन्थ की रचना हुई और ज्येष्ठ शुल्क पंचमी के दिन चतुर्विध संघ सहित कृतिक्रम पूर्वक महापूजन की गयी और इसी ग्रंथ को पालकी में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली गयी। तभी से इसी दिन से श्रुत परम्परा को लिपिबद्ध परम्परा के रूप में प्रारम्भ किया गया और श्रुत आराधना, श्रुत पंचमी के रूप मनाते आ रहे है। यह दिवस शास्त्र उन्नयन के अन्तर्गत श्रुत पंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रुत और आराधना का यह महान पर्व हमें वीतरागी संतों की वाणी , आराधना और प्रभावना का सन्देश देता है। बन्धुओं हमारे गुरू आचार्यों की कठोर तपस्या का ही फल है आज हम सभी को जिन भगवन्तों, तीर्थंकरों की वाणी ग्रन्थ , शास्त्र रूप में पढ़ने को मिल रही है। ये ही जिनवाणी आगाम वाणी है, उसी प्रकार से शास्त्र पूज्यनीय है। जिस प्रकार हम अपने आराध्य देव व गुरूओं को पूजते हैं। हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि जैन कुल में हमारा जन्म हुआ है तो हम इन शास्त्रों को जिनवाणी माँ को नित्य प्रतिदिन पढें, स्वाध्याय करें, छोटे-छोटे बालकों को युवा पीढी को संस्कारित करें, जिनवाणी की धूम-धाम से शोभायात्रा निकालें।
जिनवाणी सजाओ, निबंध आलेखन प्रतियोगिता भी आयोजित हों
शास्त्रों का संरक्षण देखभाल, शास्त्र भंडारों की सफाई अपनी इस अमूल्य निधि की सुरक्षा होनी चाहिए जिस श्रद्धा से हम हमारे आराध्यों की यथा देव, गुरु की पूजा करते हैं उसी प्रकार जिनकी माँ की पूजा हो। ज्येष्ठ सुदी पंचमी 31 मई को हम सभी को मिलकर मनाना चाहिए। अप्रकाशित दुर्लभ ग्रंथों-शास्त्रों को प्रकाशित करवाने के उद्देश्य से यथाशक्ति अपने-अपने जिन मंदिरों में दान देना चाहिए। आप सभी को बताना उचित समझता हूँ कि पूर्व में जिन मंदिरों में स्वाध्याय, जिनवाणी गद्दी हुआ करती थी, उन गद्दियों का यानि स्वाध्याय सभा का रूप होता था। सुबह-शाम जिनवाणी का वाचन, स्वाध्याय हुआ करता था आज यह परम्परा लोप हो गयी है, हम सभी का यह कर्तव्य है कि अपने स्वयं के कल्याण के साथ आगामी पीढ़ी के लिए भी इन गद्दियों को पुनः स्थापित करायें जिस प्रकार हमारे मन्दिरों में जिनेन्द्र देव की वेदियां होती हैं उसी प्रकार सुसज्जित आधुनिक संस्थानों से युक्त स्वाध्याय कक्ष, स्वाध्याय गद्दियां स्थापित होनी चाहिए। बंधुओं इस दिन प्राकृत दिवस के रूप में मनाएं।













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