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जैन समाज में छाया उत्साह : चर्या शिरोमणी आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज का भव्य मंगल प्रवेश


जैन जगत में आध्यात्म, ज्ञान, ध्यान, तप, त्याग, साधना और आगम चर्या के लिए प्रसिद्ध जैन संत, गणाचार्य श्री विराग सागर जी के सुशिष्य, पूज्य दिगंबराचार्य, चर्या शिरोमणी, आचार्य प्रवर श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश 28 सितंबर को नांदणी से 1.5 किलोमीटर दूर हरोली नगर में होगा। सकल दिगंबर जैन समाज हरोली ने आचार्य श्री ससंघ के भव्य अगवानी की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


नांदणी मठ। जैन जगत में आध्यात्म, ज्ञान, ध्यान, तप, त्याग, साधना और आगम चर्या के लिए प्रसिद्ध जैन संत, गणाचार्य श्री विराग सागर जी के सुशिष्य, पूज्य दिगंबराचार्य, चर्या शिरोमणी, आचार्य प्रवर श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश 28 सितंबर को नांदणी से 1.5 किलोमीटर दूर हरोली नगर में होगा। सकल दिगंबर जैन समाज हरोली ने आचार्य श्री ससंघ के भव्य अगवानी की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। हरोली का जैन समाज साधु-संघ के स्वागत में उत्सुकता से पलक-पांवें बिछाए बैठा है। उनके आगमन पर हर जैन श्रावक-श्राविका विशेष रूप से प्रसन्न और उत्साहित हैं।

हरोली की धरा धन्य होगी

हरोली के जैन श्रद्धालुओं का कहना है कि “जब हमारे गुरुदेव विशुद्ध सागर जी के चरण इस पावन भूमि पर पड़ेंगे, तब हरोली की धरा धन्य हो जाएगी।” आचार्य जी का मुख्य नारा “नमोस्तु शासन जयवंत हो” है, जो सत्य, अहिंसा, मैत्री, और “जियो और जीने दो” की भावना को दर्शाता है।

धर्मसभा में महत्वपूर्ण संदेश

नांदणी मठ में, आचार्य श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “हम सभी अंतिम तीर्थेश वर्धमान स्वामी के शासन में विराजते हैं। तीर्थंकर भगवान की पीयूष देशना जिनेंद्रवाणी जगत कल्याणी है।” उन्होंने संगठन की महत्ता पर भी जोर दिया, यह कहते हुए कि “संगठन ही महाशक्ति होती है, जिससे हर काम संभव है।” आचार्य जी ने उदाहरण दिया कि एक अकेला धागा शक्तिहीन होता है, जबकि जब वह अन्य धागों के साथ मिल जाता है, तो उसे तोड़ना कठिन हो जाता है। “संगठन एवं एकता में शक्ति है।” यदि धर्म, परिवार, राज्य और देश की रक्षा करनी है, तो संगठित रहना आवश्यक है।

अहिंसा का पालन

उन्होंने यह भी कहा कि “धर्म तो अहिंसा में है, जिसमें प्राणी मात्र के जीवों की रक्षा की जाती है।” जैन साधक वर्षाकाल में चातुर्मास करते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो और अहिंसा धर्म का पालन हो सके।

गुरु का उपदेश

आचार्य जी ने गुरु के उपदेशों की महत्ता को भी रेखांकित किया, कहते हुए कि “सागर की गहराई और पर्वत की ऊंचाई जगत प्रसिद्ध हैं, पर इनसे भी गहरा और ऊंचा गुरु का धर्म उपदेश होता है।” गुरु के वचन आत्मा को परमात्मा के पास पहुंचाने के साधन हैं।

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