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विदिशा के सेठजी ने किया था षठखंडागम ग्रंथ का सबसे पहला प्रकाशन : मुनिश्री संभवसागरजी ने षठखंडागम ग्रंथ ग्रंथ की रचना के बारे सविस्तार बताया 


मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ससंघ विदिशा नगर के श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। जैन धर्म और उसके इतिहास पर चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण उपरांत 683 वर्ष निकल गए लेकिन, किसी भी आचार्य ने कोई भी ग्रंथ नहीं लिखा। विदिशा से पढ़िए, यह खबर…


 विदिशा। मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ससंघ विदिशा नगर के श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। जैन धर्म और उसके इतिहास पर चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण उपरांत 683 वर्ष निकल गए लेकिन, किसी भी आचार्य ने कोई भी ग्रंथ नहीं लिखा। प्रारंभ के 160 वर्ष तक आचार्य भद्रबाहु तक यह ज्ञान उनके मुख से पूर्ण श्रुत के रूप में प्रवाहित होता रहा तथा जब उनकी श्रवणबेलगोला में संल्लेखना हुई तो विषाकाचार्य उनके नए उत्तराधिकारी के रुप में नियुक्त हुए। उनको भी 14 अंग में से 11 अंग का तो ज्ञान था लेकिन, तीन अंग उनसे भी ज्ञान का क्षयोपशम होने से विस्मृत हो गए और धीरे-धीरे यह जो ज्ञान था वह भी घटता जा रहा था।

एक स्थिति ऐसी आ गई कि पूर्व का ज्ञान विस्मृत होने की कगार पर आ गया तो आचार्य धरसेन स्वामी, जो उस समय के सबसे बड़े ज्ञानी थे। उनके पास मात्र एक अंग का ही ज्ञान तथा कुछ और स्मृति शेष बची थी। उन्होंने दूर दृष्टि से सोचा कि जब हमारे आते आते 97 प्रतिशत श्रुत ज्ञान तो विलुप्त हो गया। यदि ऐसा ही रहा तो यह ज्ञान आगे एकदम विलुप्त हो जाएगा तो गुजरात के गिरनार पर्वत पर जाकर एक गुफा में उन्होंने तपस्या की और उनके पास जो ज्ञान शेष बचा था उसे किसी योग्य शिष्य को देने की चिंता हुई। पास में महिमानगरी में यति (मुनि) सम्मेलन हो रहा था वहां बहुत से मुनिराज इकट्ठे हुए थे।

आचार्य धरसेन स्वामी ने उस यति सम्मेलन के प्रमुख आचार्य के पास खबर भेजी कि आपके यति सम्मेलन से दो योग्य मुनिओं को हमारे पास भेजें। जिससे हम भगवान महावीर की दिव्यवाणी के अंश हम उनको दे सकें तो आचार्य श्री ने सुगुप्ती और नरवाहन नाम के दो मुनिराजों को आचार्य धरसेन स्वामी के पास भेजा। जो आगे चलकर आचार्यश्री पुष्पदंत और आचार्यश्री भूतबली के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने ही ताडपत्र पर षठखंडागम नाम का ग्रंथ लिखा, जो आज भी कर्नाटक प्रांत के मूलबद्री में शास्त्र भंडार में है तथा जिसका सबसे पहले कागज पर प्रकाशन विदिशा नगर के ही सेठ शितावराय लखमीचंद ने किया था तथा षठखंडागम ग्रंथ के आधार पर ही पांच खंडों में धवला की 16 पुस्तकों का प्रकाशन आचार्यश्री वीरसेन महाराज ने किया था। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रवचन के बाद मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने प्रश्नों के माध्यम से श्रद्धालुओं के ज्ञान की परीक्षा ली एवं सही उत्तर देने वालों को समग्र पाठशाला समिति की ओर से पुरस्कृत किया।

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