रोट तीज का एक रूप है, जो विशेष रूप से जैन समाज की महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए मनाया जाता है। इस पर्व में महिलाएं उपवास रखती हैं और पारंपरिक रूप से ‘रोट’ नामक प्रसाद बनाती हैं। रोट तीज के दिन महिलाएं विशेष रूप से पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं, पूजा करती हैं, और परिवार की भलाई के लिए मंगलकामनाएं करती हैं। आइए जानते हैं इस त्योहार की व्रत कथा के बारे में…
एक समय विपुलाचल पर श्री वर्धमान स्वामी समवशरण सहित पधारे। तब श्रेणिक ने नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करी कि महाराज ! रोटतीज कैसा और इस व्रत से किसको लाभ हुआ और यह व्रत कैसे और किस विधि है, सो कृपा करके कहो। तब वर्धमान स्वामी राजा श्रेणिक से कहते भए, राजन ! एक समय उज्जैनी जादी में एक सागरदत्त नाम का सेठ रहता था। उसके छप्पन करोड़ दीनारों की साक्ष्मी देशान्तरों में माल भरकर उसके प्रोहन (जहाज) जाते थे। उस सेठ के सात कुन थे। एक दिन श्री मंदिरजी में एक व्रती मुनिराज ने यती और श्रावक के धर्मों का वर्णन किया।
श्रावकों ने अपनी शक्ति के अनुसार व्रत लिए। सागरदत्त की सेठानी ने बी प्रार्थना करी कि महाराज मुझे भी ऐसा सरल व्रत दीजिए जो कि एक साल में एक ही वक्त आवे और उसमें मैं कुछ खा सकूं। श्री मुनिराज ने फरमाया कि हे सेठानी, छत नियम थोड़े से भी इस पामर जीव को संसार से पार लगा देते हैं। श्री चौबीसी व्रत जिसे रोटतीज भी कहते हैं। साल में एक ही वक्त करना होता है। भाद्रपद शुक्ल तृतीया (तीज) को सामायिक स्नान ध्यान करके चौबीस महाराज की पूजन विधान करना चाहिए।
एक वक्त छहों रस का त्याग करके एकासन और एक ही अन्न से उसी वक्त अन्न और पानी से अन्तरायरहित नियमपूर्वक करना चाहिए। इससे लक्ष्मी अटल रहती है। व्रत के दिन कुकथाओं का त्याग करके शीलसहित धर्मध्यान में लीन रहना चाहिए। चार प्रकार का दान देना चाहिए। यह व्रत तीन, बारह व चौबीस वर्ष करना चाहिए। श्रावक के षट्कर्म का (देवपूजा, गुरुसेवा, स्वाध्याय, संयम, तप, दान) पालन करना चाहिए। सेठानी श्री गुरु को नमस्कार करके और व्रत लेकर घर आई। घर आकर सेठानी ने अपने कुटुम्ब परिवार से व्रत लेने के विषय में कहा। कुटुम्ब परिवार ने कहा कि फूलों में रखकर कोमल चावल, घी, शक्कर, मेवा आदि उत्तम पदार्थों के मिश्रण से जो भोजन किया जाता है वो हजम नहीं होता है तो ऐसा कठोर व्रत कैसे किया जावेगा? कुटुम्ब परिवार के निन्दा से सेठानी ने व्रतों का त्याग कर दिया। व्रत भंग के पापोदय से सर्व लक्ष्मी नष्ट हो गई। मोतियों का पानी हो गया, रत्नों व सोने-चांदी ढेर थे वो पत्थर-कंकड़ों के ढेर हो गए। देशान्तरों के प्रोहन (जहाज) जहाँ के वहाँ रह गए। धन के अभाव में दास-दासियां सब भाग गए, दिन बड़े ही कष्ट में व्यतीत होने लगे।
अब सेठ-सेठानी और सातों पुत्र और उनकी स्त्रियां, इस प्रकार सोलह प्राणियों ने देशान्तर जाने का विचार किया और उज्जैनी नगरी छोड़कर बाहर निकल गए।हस्तिनापुर में सागरदत्त सेठ की पुत्री परनाई थी। संकट के कुछ दिन काटने की इच्छा से हस्तिनापुर जाकर पुत्री को खबर पहुँचाई कि हमारे ऊपर संकट पड़ गया है, सो तेरे पास मदद के लिए आये हैं। हमारे संकट के कुछ दिन के लिए सहायक होना चाहिए। पुत्री ने ऐसी बात सुनकर खबर लाने वाले को कहा कि मेरे ससुराल वाले यह कहने लग जायेंगे कि हमारा धन चोरी-चोरी कर पीहर पहुँचा देती है। अतः मेरे से ऐसा कष्ट नहीं सहा जाएगा, इसलिए ये कष्ट के दिन दूसरी जगह जाकर बितावें। और थाली में दाल-भात भोजन की सामग्री एक वक्त का भोजन और उसमें पांच रत्न रखकर छिपा कर भेज दिये। सेठ के पापोदय और सेठानी के व्रत भंग दोष से वो थाल मिट्टी का बरतन भोजन सामग्री कीड़ों सहित और मोहरों के कोयले बन गए। उसे वो उसी जगह खड्डा खोदकर गाड़ दिए और बसन्तपुर ससुराल थी, वहाँ कुछ समय कष्ट के दिन काट देने की इच्छा से गए। उस दिन सागरदत्त सेठ के साला रामजी सेठ के यहां जीमनवार थी। इस जीमनवार की खबर सुनकर उन्होंने विचार किया कि इस वक्त रामजी सेठ के यहां जीमने वास्ते बड़े-बड़े लोग आए होंगे, ऐसी गरीबी अवस्था में हमारा वहां पहुंचना ठीक नहीं होगा और रात के वक्त अँधेरे में चलेंगे। कई दिनों की भूख से सभी अधीर हो रहे थे। सागरदत्त सेठ की स्त्री ने कहा कि भूख शांति के लिए मैं जाकर थोड़ा-सा चावलों का पानी (माड़) जो मकान के पिछवाड़े के नाले से गिर रहा है ले आती हूँ। एक मटकी (हांड़ी) ले जाकर नाले के नीचे रख दी।
मकान के ऊपर रामजी सेठ की स्त्री खड़ी देख रही थी। उसने अपनी ननद को ऐसी गरीब हालत में देखकर विचार किया; इनका धन नष्ट हो गया है और अब यहाँ हमको सताने आये हैं। ऐसा विचार करते हुए जिस नाले में चावल का मांड जा रहा था, उस नाले में एक पत्थर सरका दिया। वो पत्थर पड़ने से नीचे रखी हुई मटकी (हांड़ी) फूट गई और चावल का गरम-गरम मांड़ सेठानी के पैरों पर गिरा जिससे वह जल गई और बहुत दुःखित हुई। पुत्र खबर पाकर कपड़े की झोली में डालकर उठा ले गये।
अयोध्या में सागरदत्त सेठ का मित्र रहता था। सेठ अपने कुटुम्ब को दूसरे ठिकाने छोड़कर अकेला ही अपने मित्र से मिलने गया। मित्र ने भली-भांति आदर-सम्मान किया और धैर्य देते हुए कहा कि हे मित्र, संतोष धारण करो, हमारे धन को तुम अपना ही समझकर कुटुम्ब को दूसरे ठिकाने छोड़कर क्यों आये? क्या इस घर को तुमने दूसरा समझा था? दोनों आपस में रात के वक्त महल में दुःख-सुख की बात करते हुए आधी रात्रि व्यतीत हो गई। मित्र तो उठकर दूसरे ठिकाने लेने चला गया और सागरदत्त सेठ वहां ही रहा। उस वक्त वहां चित्राम का मड़ा हुआ मोर था। उसके गले में सोने का हार लटक रहा था। पापोदय से चित्राम का मड़ा मोर उस हार को निगल रहा था और सेठ पड़े-पड़े देख रहे थे। सेठ ने विचार किया कि दिन निकलते ही मुझे यह चोरी का कलंक लगेगा और मैं कैसे रहूंगा? ऐसा विचार कर रात्रि में ही चला गया और अपने कुटुम्ब से जाकर सब हकीकत कही। उधर मित्र ने बहुत अफसोस किया कि मैं बहुत सेवा करने वाला था, वह चला क्यों गया? वहाँ से चलकर वे चम्पापुरी में समुद्रदत्त सेठ के घर पहुँचकर अपने दुःख की सब हकीकत कही। सेठ ने हर एक प्राणी को दो सेर खाई के गले हुए जौ और दो पैसे भरकर कड़वा तेल रोज की मजदूरी में रख लिया। स्त्रियाँ घर का काम करती थीं और पुरुष दुकान का काम करते थे। सागरदत्त सेठ ने समुद्रदत्त सेठ की स्त्री को धर्मबहिन बना लिया था। कुछ दिन बाद भाद्रपद शुक्ल दूज को समुद्रदत्त की स्त्री ने सबको कहा कि कल हर एक काम सफाई से करना; क्योंकि कल व्रत का दिन है। सागरदत्त के छोटे बेटे की स्त्री ने पूछा कि कल कौन व्रत है और इससे क्या होता है और कैसे किया जाता है? समुद्रदत्त सेठ की स्त्री ने व्रत की उपरोक्त विधि बताते हुए कहा कि इससे लक्ष्मी बढ़ती है। सागरदत्त की पुत्रवधू ने व्रत पर दृढ़ श्रद्धा करते हुए अपने भाग्य की जौ की रोटी बनाकर सब के साथ गुप्त रीति से ले गई और चढ़ाते हुए प्रार्थना करी कि हे प्रभु! हम तो रत्नों का नैवेद्य चढ़ाने लायक थे; परन्तु आज हमारी ऐसी संकटापन्न स्थिति है कि मैं उपवास करके अपने भाग्य का नैवेद्य बनाकर आपको अर्पण कर रही हूं और करुणा भरी पुकार करी।
व्रत में दृढ श्रद्धा की वजह से इतना पुण्य उपार्जन हुआ कि चढ़ाया हुआ नैवेद्य तुरन्त ही सुवर्ण रत्नों का बन गया और पंचों को खबर मिलने से पंच लोग आश्चर्य करने लगे। उस तरफ समुद्रदत्त सेठ की स्त्री ने एक बड़ा रोट बनवाकर सागरदत्त की स्त्री को देते हुए कहा कि भोजाई यह रोट आज तुम्हारे बच्चों को दे देना। उसने पूछा कि ननदजी, आज यह कौनसा त्यौहार है कि आज उत्सव मनाया जा रहा है। उसने कहा कि आज चौबीसी व्रत अर्थात् रोटतीज व्रत है और इसकी आराधना से संकट नहीं आता है।
सागरदत्त की स्त्री को मुनिराज के दिये हुए व्रत की याद आने और उसे भंग कर देने (छोड़ देने) से बड़ा भारी पश्चाताप हुआ और यह भी जाना कि इस व्रत भंग के दोष से ही हमारी यह संकटापन्न स्थिति हो गई है। पश्चाताप करते हुए उसने व्रत करने का निश्चय किया। व्रत पर श्रद्धा होने से और भूल का पश्चाताप होने से पुण्य का उदय हुआ जिसके प्रभाव से हाथ में आया हुआ रोट तुरन्त ही सुवर्ण का बन गया। सुवर्ण का रोट देखकर लोभ उत्पन्न होने से समुद्रदत्त सेठ की स्त्री ने कहा कि भोजाई, आटे का और सुवर्ण का रोट दोनों पास-पास रखे थे, सो गलती से यह सुवर्ण का रोट आ गया और गेहूं का वहीं रह गया। यह सुवर्ण का रोट मुझे वापिस दे दो। गेहूँ का रोट मैं तुम्हारे लिए ले आती हूँ। यह रोट समुद्रदत्त सेठ की स्त्री के हाथ में जाते ही गेहूं का बन गया। तब समुद्रदत्त की स्त्री कहने लगी कि भोजाई, अब तुम्हारे पुण्य का उदय आ गया है जिससे तुम्हारे हाथ में आते ही सुवर्ण का रोट बन जाता है।
उधर सागरदत्त ने व्यापार-धन्धा किया जिससे वापस करोड़पति हो गये। वहाँ से रवाना होकर मित्र के घर अयोध्या आये। मित्र ने जैसा सम्मान पहले किया था वैसा ही अरू भाव से प्रेमपूर्वक अब भी किया।
दोहा-
सौ सज्जन आज लाख मित्र, मजलिस मित्र अनेक। दुःख काटन विपदा हरन, सो लाखन में एक ॥
लेकिन नौकर लोग कहने लगे कि यह वो ही सेठ है जो पहले मोर के गले से हार निकालकर ले गये थे। उसी द्रव्य से कमाई करके करोड़पति बनकर आये हैं और अब भी कुछ लेने आये हैं, इनकी चौकस रखना। रात के वक्त उसी चित्रशाला में दोनों मित्र दुःख-सुख की बात कर रहे थे, उस वक्त वोही चित्राम का मड़ा हुआ मोर उस हार को वापिस उगलने लगा। तब सबको बुलाकर दिखाया कि उस दिन वो था कि चित्राम का मोर हार निगल गया था और आज यह दिन है कि चित्राम का मोर उगल रहा है। वहाँ कुछ दिन रहकर सेठ अपनी ससुराल बसन्तपुर आये। रामजी सेठ खबर पाकर लेने को आये। बहन ने कहा कि भाई तुम हमारे धन को देखकर लेने आये हो अगर हमें चाहते तो संकट में पहले मदद करते, उस वक्त भोजाई ने माड़ भी नहीं लेने दिया। गरम-गरम चावलों के माड़ पर पत्थर गिराया जिससे मेरा अंग जला जो अभी तक अच्छा नहीं हुआ। रामजी सेठ ने कहा, बहिन उस वक्त तुम्हारे पापोदय से कुबुद्धि सूझती थी, समझाकर अपने घर ले गये। कुछ दिन बाद हस्तिनापुर में अपनी पुत्री के यहां चले गये। पुत्री खबर पाकर बहुत-सी सहेलियों को साथ लेकर गाजे-बाजे के साथ अगवानी को आई।
होत की बहन अनहोत का भाई, नैना पीछे नार पराई।
भाइयों ने कहा कि हे बहन, उस दिन को यादकर जब हम संकटग्रस्त आये थे तो तू एक दिन भी रखने को राजी न थी, न मिलने को ही आई बल्कि ठीकरे में कीड़े और कोयले से भरकर भेजे थे जिन्हें हम यहां गाड़ गये थे। बहन ने कहा कि भाइयों, मैंने तो भोजन ही भेजा था, तुम्हारे पापोदय से ऐसा बन गया। अगर मैं मिलने को उस अवस्था में आती तो मेरी ससुराल और तुम्हारी दोनों की बदनामी होती। सागरदत्त सेठ ने अपनी पुत्री को धन, जेवर देकर विदा किया। वहाँ से अपने देश उज्जैनी को वापिस आ गये जो लक्ष्मी पहले विलोप रूप हो गई थी; वो सब अपनी असली अवस्था में मिली। दास, नौकर-चाकर सब आ मिले। देशांतरों के प्रोहन जो जहाँ के तहां रुक गए थे वे सब पुण्य के प्रभाव व्रत के दृढ़ श्रद्धा में आ मिले। इससे हे जीवों, व्रत भंग को महादोष समझकर हर एक को व्रत दृढ़ श्रद्धा से करना चाहिए और उसकी कथा बांचना, सुनना, अनुमोदन करना चाहिए। चाहे कोई भी व्रत हो व्रत करने वाले को पूजा दान, समायिक जरूर ही करना चाहिए।
ॐ ह्रीं वृषभादि महावीरपर्यन्तः चतुर्विंशति तीर्थंकरे अ सि आ उ सा नमः स्वाहा। जाप (108)













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