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संपत्ति का प्रयोग दूसरे के लिए करने का भाव ही दान : मुनि श्री सारस्वत सागर जी के नांद्रे में नित प्रवचन जारी


मुनि श्री सारस्वत सागर जी ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन में कई प्रकार कि क्रिया आपको करनी पडती हैं, तब आप कहीं जाकर अपने आप जीवन को जी पाते हो। कहीं पर देना पड़ता है तो कहीं पर लेना पड़ता है लेने-देने के जो व्यवहार की क्रिया है।नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…


नांद्रे। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष श्री अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन में कई प्रकार कि क्रिया आपको करनी पडती हैं, तब आप कहीं जाकर अपने आप जीवन को जी पाते हो। कहीं पर देना पडता है तो कहीं पर लेना पडता है लेने-देने के जो व्यवहार की क्रिया है। यह संबंधो को मजबूत भी करती है तो कई बार संबंधो के विनाश का कारण बन जाती है।

जहाँ देना है लेना कुछ नहीं है वहाँ पुरुष अपने में वीरता का अनुभव करता है। कहीं-कहीं देखा जाता है कि लोगों के पास बहुत संपत्ती होती है परंतु उनको उस संपत्ति का प्रयोग दूसरे के लिए करने का भाव हो जाता है। जोड़ते-जोड़ते मर जाए परंतु किसी कि सहायता नहीं कर पाते, वे पुरुष कभी भी समाज में सम्मान को प्राप्त नहीं होते।

सम्मान, यश को प्राप्त करना है तो आपको अपने जीवन से जुडी हुई वस्तुओं का दान देना पड़ेगा। कहीं पर अपने समय का दान देना पड़ता है तो कभी कहीं पर धन का दान देना पडता है। दान देने से अहंकार में न्यूनता आती है, पुण्य का अर्जन होता है, पाप का विनाश होता है, जन – जन में पहिचान बनती है और मूल कारण है कि हमारी लोभ कषाय में मंदता हो या कषायों कि शून्यता हो तो पुरुष वीर पुरुष कि श्रेणी में आता है। इसलिए दानवीर भी वीर है।

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