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आत्म परिणाम से होती हैे सुख और दुःख की अनुभूति: आचार्यश्री वर्धमानसागरजी ने विहार के दौरान कहा कि हम सब पुण्यशाली हैं


राजकीय अतिथि आचार्यश्री वर्धमान सागर जी सहित सप्त ऋषियों का मंगल विहार पीपल्दा पंचकल्याणक के लिए चल रहा है। शुक्रवार को दोपहर 6.6 किमी विहार कर संघ का रात्रि विश्राम सोगानी कॉलेज रवासा पर हुआ। पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


पीपल्दा। राजकीय अतिथि आचार्यश्री वर्धमान सागर जी सहित सप्त ऋषियों का मंगल विहार पीपल्दा पंचकल्याणक के लिए चल रहा है। शुक्रवार को दोपहर 6.6 किमी विहार कर संघ का रात्रि विश्राम सोगानी कॉलेज रवासा पर हुआ। 23 नवंबर को 3.5 किमी विहार कर आचार्य श्री संघ का मंगल प्रवेश बोली में हुआ। मुनि श्री हितेंद्रसागर जी, मुनि श्री भुवनसागर जी ( मुनि दीक्षा के बाद प्रथम बार) जन्म भूमि बोली में आए हैं। ससंघ की आहार चर्या बोली में होगी। इसके पूर्व आचार्य श्री वर्ष 2022 में बोली आए थे। अनायास मुनि श्री श्रेयस सागर जी की समाधि 18 दिसंबर 2022 को हुई थी।

हमारी शक्ति में कर्म बंघ बाधक बन गए

आचार्यश्री वर्धमानसागरजी महाराज ने विहार के दौरान धर्मसभा में उपस्थित श्रावकों से कहा कि हम सब पुण्यशाली हैं कि हमें भी कभी ना कभी भगवान के समवशरण में श्रोता बनने का सौभाग्य मिला। हम आत्म परिणामों से सुख या दुःख का अनुभव करते हैं। आप लोग जाने अनजाने में कर्म का बंधकर लेते हैं। हमारी आत्मा के गुणों में कई बाधक तत्व भी हैं। हमारी शक्ति में कर्म बंघ बाधक बन गए। हमारे पास जो भी है कर्म बंघ में है। हमें हमेंशा अपनी दृष्टि को सम्यक रखना चाहिए। पाप हमारे जीवन में प्रति दिन, प्रतिक्षण होते हैं। पापों का प्रक्षालन हम करना चाहते हैं लेकिन, हमारी श्रद्धा और आस्था नहीं बनती है। णमोकार महामंत्र तो लाखों मंत्रों का जन्मदाता है। उसी से सारे मंत्र बने हैं।

हमने जड़ को छोड़ दिया है

आपको यदि रोग दूर करने के लिए मंत्र देते हैं ,धन प्राप्ति के लिए मंत्र देते हैं तो भी सारी बात तो अर्थहीन हो जाती है कि हमने जड़ को छोड़ दिया है। हम डाल, पत्तों में ही लगे हुए हैं। इसलिए जीवन में सुख और शांति का अभाव हमें दिखाई देता है। आचार्यश्री ने कहा कि पुण्यवानों को ही अच्छी वस्तुएं मिलती है और पुण्य कर्मों से ही उन्हें प्राप्त होती है। सुनीता शाह, बाबूलाल शाह, जितेंद्र शाह ने बताया कि आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी दूसरी बार एवं मुनि श्री भुवन सागर जी की दीक्षा के बाद पहली बार गृहस्थ अवस्था की जन्म और कर्म भूमि बोली नगर है। संपूर्ण नगर गौरवान्वित एवं आल्हादित है। संपूर्ण नगर को फ्लेक्स, बैनर, रांगोली और वंदनवार से सजाया गया हैं।

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