दसलक्षण पर्व त्रैकालिक शाश्वत पर्व है। यह पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष से और न ही किसी घटना विशेष से संबंधित है, बल्कि इसका संबंध तो आध्यात्मिक भावों से है। यह प्रकृति के उत्थान से प्रारंभ हुआ पर्व है। प्रकृति और उसके साधनों का उपयोग मनुष्य ने जब से भोग, विलास के लिए प्रारंभ किया, उसी समय से प्रकृति की सुंदरता के विनाश का क्रम आरंभ होना शुरू हो गया। पढ़िए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर का विशेष आलेख…
दसलक्षण पर्व त्रैकालिक शाश्वत पर्व है। यह पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष से और न ही किसी घटना विशेष से संबंधित है, बल्कि इसका संबंध तो आध्यात्मिक भावों से है। यह प्रकृति के उत्थान से प्रारंभ हुआ पर्व है। प्रकृति और उसके साधनों का उपयोग मनुष्य ने जब से भोग, विलास के लिए प्रारंभ किया, उसी समय से प्रकृति की सुंदरता के विनाश का क्रम आरंभ होना शुरू हो गया। याद रखें, जब प्रकृति और उसके साधनों का उपयोग आध्यात्मिक साधना के लिए किया जाने लगता है तो प्रकृति की सुंदरता पुन: धीरे-धीरे लौटना प्रारंभ हो जाती है। प्रकृति के उत्थान और पतन के पीछे पुण्य और पाप कर्म बंध हैं।
प्रकृति का सौंदर्य फिर से लौटने की खुशी
धर्म के अनुसार सुख, आयु, कषाय आदि जिसमें कम होती हैं, उसे अवसर्पिणी काल और जिसमें ये बढ़ती हैं, उसे उत्सर्पिणी काल कहते हैं। इन दोनों के बीच के संक्रमण काल में 98 दिन होते हैं। जिसमें प्रारंभ के 49 दिन तक सात-सात दिन तक सात-सात प्रकार की वर्षा होती है। इसमें विष, शीतल जल, धूम, धूल, पत्थर, अग्नि आदि की वर्षा भी शामिल है। इसके फलस्वरूप पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाती है, सौंदर्य चला जाता है। इसके बाद प्राकृतिक सौंदर्य लौटने के सात-सात दिन तक शीतल जल, अमृत, घी, दिव्य रस, दूध आदि की वर्षा होती है। इससे पृथ्वी हरी-भरी हो जाती है और चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ पड़ती है। इस प्रकार 49 दिन तक कुवृष्टि और 49 दिन तक सुवृष्टि होती है। 49 दिन की सुवृष्टि का प्रारंभ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी से होता है और वह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक चलती है। कुवृष्टि से पहले जिन कुछ जोड़े मनुष्य और तिर्यंच, देवों और विद्याधरों ने विजयार्थ पर्वत की गुफा में छिपाए थे, उन्हें निकाला जाता है। वही जोड़े भाद्रपद शुक्ल पंचमी से 10 दिवसीय उत्सव मनाते हैं। उसे ही आज दसलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है। धर्म के अनुसार इस कथा से यह तो स्पष्ट है कि यह पर्व वास्तव में प्रकृति के सौंदर्य के पुनः लौटने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है।
लें कोई संकल्प
दसलक्षण प्रारंभ होने के दिन एक या अधिक प्रकृति संरक्षण मंगल कलश की स्थापना की जाए, उससे जो धन एकत्रित हो उसका उपयोग नगर में तीर्थंकर वन या नगर/गांव को हरा-भरा बनाने के लिए पौधारोपण अभियान शुरू करने के लिए किया जा सकता है। इस अवसर पर हम भूजल के स्तर को बढ़ाने, तालाब का निर्माण और वर्षा जल को संरक्षित करने का संकल्प कर सकते हैं। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए साइकिल, पैदल या सार्वजनिक वाहनों का अधिक से अधिक उपयोग करने का प्रण ले सकते हैं।
औरों को भी दें प्रेरणा
कुल मिलाकर वे सारे संकल्प लें, जिनसे प्रकृति का संरक्षण हो। इसमें खादी पहनने का संकल्प भी शामिल हो सकता है। याद रखें, धर्म स्वयं के लिए ही है तो स्वयं संकल्प करें और कम से कम पांच मनुष्यों को ऐसा करने की प्रेरणा दें तो एक नई शुरुआत हो सकती है। यह संकल्प पर्व के दूसरे हिस्से को भी पूरा करेगा और तभी दसलक्षण पर्व मनाने की सार्थकता और पर्व के पीछे छिपे रहस्यों को धीरे-धीरे जान सकेंगे।













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