समाचार

छह ढाला में आचार्य कुंदकुंद स्वामी के ग्रंथों का सार : आर्यिका सिद्ध श्री माताजी जी ने पंडित दौलतराम जी का किया गुणानुवाद 


पंडित दौलत राम जिनशासन के उच्च कोटि के विद्वान हुए हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आध्यात्म का सागर भर दिया है। यही वजह है कि जैन समाज के प्राचीन कवियों में कविवर पंडित दौलतराम का नाम बहुत सम्मान एवं आदर से लिया जाता है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर…


इंदौर। पंडित दौलत राम जिनशासन के उच्च कोटि के विद्वान हुए हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आध्यात्म का सागर भर दिया है। यही वजह है कि जैन समाज के प्राचीन कवियों में कविवर पंडित दौलतराम का नाम बहुत सम्मान एवं आदर से लिया जाता है। उनकी प्रसिद्ध कृति छह ढाला आध्यात्मिक दृष्टि से एक बहुत ही महत्वपूर्ण रचना है। जो संसारी जीवों की चतुरगति के परिभ्रमण के कारण और निदान की वास्तविक जानकारी को प्रस्तुत करती है। यह विचार जिनवाणी पुत्री आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने अपनी छहढाला स्वाध्याय की कक्षा में प्रवचन के माध्यम से व्यक्त किए।

वीतराग विज्ञानता अर्थात् रागद्वेष रहित ज्ञान

आर्यिका श्री ने बताया कि पंडितजी अपने मंगलाचरण में लिखते हैं कि तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता। शिव स्वरूप शिवकार, नमहुं त्रियोग सम्हारिवैं।। इन पंक्तियों का अर्थ बताते हुए आर्यिका माताजी ने कहा कि त्रिभुवन अर्थात् तीन लोकों में जो सार भूत और सर्वाेत्तम वस्तु है, वह है वीतराग विज्ञानता अर्थात् रागद्वेष रहित ज्ञान अर्थात केवल ज्ञान। यही केवल ज्ञान आनंद स्वरूप है, अनंत सुख को देने वाला है और संसारी बंधनों से मुक्त कराने वाला है। मतलब मोक्ष रूपी अवस्था को प्राप्त करवाने वाला है। अतःमैं मन-वचन-काय को संभालकर उस केवल ज्ञान रूपी स्वरूप, वीतराग अवस्था अर्थात अरिहंत सिद्ध भगवान को नमस्कार करता हूं। अंत में मां सिद्धश्री ने कहा कि इस संसार में जन्म मरण के दुष्चक्र से निकलने के लिए एक मात्र वीतराग देव की शरण है, उनकी स्तुति हर प्राणी के लिए कल्याणकारी है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page