दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 130वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“कहे कबीर देय तू जब तक तेरी देह,
देह खेह जाएगी, कौन कहेगा देह॥”
इस दोहे में कबीरदास जी जीवन की क्षणभंगुरता, शरीर की सीमितता और आत्मा के धर्म पर गहरी दृष्टि डालते हैं।
वे कहते हैं कि मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका शरीर नश्वर है, और यह जीवन केवल थोड़े समय के लिए मिला है — एक साधन के रूप में, साध्य नहीं।
“देह खेह जाएगी” —
कबीर हमें स्मरण कराते हैं कि यह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा, धूल में मिल जाएगा।
यह शाश्वत नहीं है, बल्कि एक दिन मृत्यु को प्राप्त होना तय है।
जिस शरीर को हम संवारने, सजाने और सुख देने में लगे रहते हैं —
वह अंत में “खेह” (मिट्टी) बन जाएगा।
उस क्षण न यह शरीर कुछ कर सकेगा, न ही कोई इसकी चर्चा करेगा।
“देय तू जब तक तेरी देह” —
इस पंक्ति में गहरी प्रेरणा छिपी है। कबीर कहते हैं:
“जब तक शरीर है, तब तक कर” — सेवा कर, साधना कर, प्रेम कर, परोपकार कर।
यही वह समय है जब आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का अवसर मिला है।
जब प्राण हैं, तभी प्रयास संभव है।
मरणोपरांत पछताने से कुछ नहीं होगा।
संदेश और शिक्षण:
यह दोहा आत्म-जागरण का संदेश देता है।
कबीर हमें चेताते हैं कि इस देह को आत्मा के साधन के रूप में समझो, साध्य मत बनाओ।
आज मनुष्य शरीर के सुख, भोग, माया, इच्छाओं और दिखावे में इतना उलझ गया है कि
वह अपने आत्मिक उद्देश्य को भूल बैठा है।
हे मानव!
जब तक शरीर में जीवन है, जब तक साँसें चल रही हैं —
तब तक भक्ति कर, सेवा कर, सच्चाई से जी।
क्योंकि एक बार यह शरीर नष्ट हो गया, तो फिर कुछ भी संभव नहीं होगा।
जीवन का मूल धर्म:
कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से हमें एक सीधी, किन्तु गहरी चेतावनी देते हैं:
समय सीमित है।
शरीर नश्वर है।
मूल उद्देश्य आत्मा की साधना है।
इसीलिए — जागो, चेतो और जीवन को सार्थक बनाओ।
क्योंकि अंत में वही गिना जाएगा जो तुमने आत्मा के लिए किया, न कि शरीर के लिए।













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