दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -128 सबके भीतर वही चैतन्य, वही आत्मा, वही ब्रह्मतत्त्व विद्यमान है : हमारे जीवन की दिशा हमारे चित्त, विवेक और पुरुषार्थ पर निर्भर है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 128वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“कबीर लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।

ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर॥”


कबीरदास जी इस दोहे में “मनुष्य जीवन की एकता और उसकी विविधताओं” का रहस्य अत्यंत सूक्ष्मता और सरलता से उजागर करते हैं।

“लोहा एक है” — इसका तात्पर्य यह है कि सब जीवों का मूल तत्व एक ही है। सबके भीतर वही चैतन्य, वही आत्मा, वही ब्रह्मतत्त्व विद्यमान है।

कोई भी जन्म से ऊँचा या नीचा नहीं होता। सबका आरंभिक स्वरूप समान है।

“गढ़ने में है फेर” — यही दोहे का सार है। यहाँ कबीर यह संकेत देते हैं कि हमारे जीवन की दिशा, मूल्य और प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम अपने आपको कैसे गढ़ते हैं।

“गढ़ना” केवल बाह्य प्रयास नहीं, बल्कि आत्मिक तप, विवेकपूर्ण निर्णय, साधना, शिक्षा और चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है।

एक ही तत्व, भिन्न परिणाम:

तलवार (शमशेर) और कवच (बख्तर) — दोनों एक ही लोहे से बनते हैं। फिर भी एक विनाश का प्रतीक है, तो दूसरा रक्षा का।

यह उपमा दर्शाती है कि मनुष्य का मूल स्वभाव तो समान है, परंतु उसका विकास और दिशा तय करती है कि वह इस संसार में अंधकार फैलाएगा या प्रकाश।

कबीर यह कह रहे हैं कि ईश्वर ने सभी को समान तत्वों से रचा है, लेकिन यह हमारी साधना, संगति, उद्देश्य और आत्म-विकास है, जो यह निर्धारित करता है कि हम रक्षक बनेंगे या संहारक।

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भगवद्भाव से रहित जीव माया में फँसा रहता है, जबकि भगवत्संग और साधना से वह ब्रह्ममय हो जाता है।

उसी प्रकार जैसे लोहा चुंबक के संपर्क में आकर चुम्बकीय गुण प्राप्त कर लेता है — उसी प्रकार जीव भी परमात्मा के संग में आकर दिव्य स्वरूप प्राप्त कर सकता है।

यह दोहा हमें क्या सिखाता है?

यह दोहा हमें कर्तव्य, आत्म-निर्माण और साधना की शक्ति का बोध कराता है।

यह बताता है कि हमारे जीवन की दिशा हमारे चित्त, विवेक और पुरुषार्थ पर निर्भर है।

मनुष्य चाहे तो अपने साधना, प्रेम, सेवा और विवेक से दूसरों के लिए ढाल (रक्षक) बन सकता है,

या फिर क्रोध, अहंकार और लोभ के प्रभाव में आकर तलवार (विनाशक) भी।

कबीरदास जी इस विचार को अंत में एक अत्यंत प्रेरक भाव में रूपांतरित करते हैं:

“तू क्या बना है, यह महत्वपूर्ण नहीं।

तू क्या बन सकता है — यही सबसे महत्वपूर्ण है।”

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