दसलक्षण पर्व आध्यात्मिक शांति, समृद्धि को जन्म देने वाला, स्वयं की आत्मिक शक्ति प्रकट करने वाला, मानव के भीतर मानवता का जन्म देने वाला, स्वयं को समझने का अवसर देने वाला, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विवादों को दूर करने वाला महापर्व है। दसलक्षण पर्व के विस्तार को नहीं समझने के चलते ही मनुष्य के भीतर की मानवता दूर होती चली जा रही है। पढ़िए रेखा संजय जैन की विशेष प्रस्तुति…
दसलक्षण पर्व आध्यात्मिक शांति, समृद्धि को जन्म देने वाला, स्वयं की आत्मिक शक्ति प्रकट करने वाला, मानव के भीतर मानवता का जन्म देने वाला, स्वयं को समझने का अवसर देने वाला, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विवादों को दूर करने वाला महापर्व है। दसलक्षण पर्व के विस्तार को नहीं समझने के चलते ही मनुष्य के भीतर की मानवता दूर होती चली जा रही है। आज मनुष्य एक-दूसरे को मारकर, नीचा दिखाकर भी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताना चाहता है। यहां तक कि मनुष्य की प्रवृत्ति राक्षसी होती जा रही है। दसलक्षण पर्व के दस धर्म मनुष्य को आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ आत्मिक गुणों से जोड़ते हैं। दसलक्षण पर्व के दस धर्म उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य हैं। ये दस धर्म सीखने, छोड़ने और कर्म करने की प्रेरणा देते हुए हमें अपनी पहचान स्वयं से करवाते हैं।
छोड़ने का उत्साह
देखा जाए तो चार प्रमुख कषाय हैं, जिनमें मनुष्य जकड़ा हुआ है, क्रोध, मान, माया और लोभ। क्रोध व्यक्तित्व का नाश करता है जैसे दुर्योधन का हुआ। मान प्रतिभा का नाश करता है जैसे रावण का हुआ। माया विश्वास का नाश करती है जैसे शकुनि का हुआ और लोभ समूची मानवता का नाश करता है। प्रारंभ के चार धर्म उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच धर्म इन्हीं चारों कषायों का जन्म नहीं होने देते। इन कषायों को छोड़ने का उत्साह ही दसलक्षण पर्व देता है।
सीखने की प्रेरणा
सत्य बोलने से भय दूर होता है, वास्तविकता से परिचय होता है और ईमानदार बने रहने की प्रेरणा मिलती है। संयम धर्म धारण करने से प्रकृति के संरक्षण की प्रेरणा भी मिलती है और इन्द्रियों का दमन होता है। तप धर्म से शरीर निरोगी होता है और किए पापों के प्रति पश्चाताप होता है। त्याग धर्म से अशुभ कर्म की निर्जरा और पुण्य कर्म का बंध होता है।
चिंतन का समय
पर्व के दस दिनों में चिंतन करें। मेरा कोई नहीं है, मैं स्वयं अपने सुख-दुःख का कारण हूं। क्या हो रहा, कौन कर रहा, क्यों कर रहा, कैसे कर रहा, इनसे दूरी बनाने वाला ही जीवन में सुख की अनुभूति कर सकता है। दूसरों का बुरा कर कभी अपने भले का कभी नहीं सोचूंगा। किए हुए उपकार का स्मरण नहीं करूंगा और स्वयं पर हुए उपकार को नहीं भूलूंगा। दसलक्षण हमें इस चिंतन का अवसर देता है कि आखिरकार अहंकार पतन के साथ अंधकार की ओर ले जाता है और स्वयं के स्वरूप से दूर करता है।













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