वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से किशनगढ़ रेनवाल के शशिकांत पाटनी की क्षुल्लकदीक्षा हुई थी और उन्हें क्षुल्लक श्री सर्वार्थ सागर जी नाम दिया गया था। 17 अप्रेल की शाम को ही उनका समाधिमरण हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
उदयपुर। वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से किशनगढ़ रेनवाल के शशिकांत पाटनी की क्षुल्लकदीक्षा हुई। आचार्य श्री ने पंच मुष्ठी केश लोच किये गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किये गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया। श्री शशिकांत पाटनी किशनगढ़ रेनवाल का दीक्षा पश्चात नूतन नाम क्षुल्लकश्री सर्वार्थ सागर किया गया। पुण्यार्जक परिवारों द्वारा नूतन क्षुल्लक जी को पिच्छी कमंडल शास्त्र एवम कपड़े दान किये गए। इसके बाद शाम को ही समाधि होने से क्षुल्ल्क सर्वार्थ सागर जी समाधि होने से डोला यात्रा निकाल कर अग्नि संस्कार किए गए।

दीक्षा प्राप्ति से आत्मसाधना
इससे पहले आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में प्रेरणा प्राप्त कर मनुष्य पर्याय की सार्थकता प्राप्त करनी चाहिए। गुरु के सानिध्य से रत्नत्रय रूपी सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान ,सम्यक चारित्र की प्राप्ति होती है। अध्यात्म का प्रवेश द्वार दीक्षा है। जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का मार्ग ही दीक्षा है। आचार्य श्री ने आगे बताया कि भोगों से विरक्ति होने पर दीक्षा प्राप्त कर आत्म साधना की जाती है। दीक्षा से तपस्वी का प्रथम चरण प्रारम्भ होता है, जो सम्यक संल्लेखना समाधि तक चलता है। गुरु चरणों के सानिध्य में समर्पण श्रद्धा के बिना आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता है। शक्ति-भक्ति से भगवान बन सकते हैं। भगवान की भक्ति तथा व्रतों को धारण करना चाहिए। आपको भी दीक्षा महोत्सव देखकर दीक्षा लेने व्रत प्रतिमा नियम की भावना करना चाहिए। पाटनी परिवार ने संघ की बहुत सेवा समर्पण भाव से की है। गुरुसेवा का फल दीक्षा रूप में मिला है। भव्य जीव की भावना यही है कि गुरु चरणों मे समाधि लेकर जीवन को सफल बनाएं।













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