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ऋषभ कथा एवं महा अर्चना विधान का छठे दिन : ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत पड़ा- आचार्य पुलक सागर


आचार्य पुलक सागर जी महाराज ने भट्टारक यश कीर्ति दिगंबर जैन गुरुकुल में आयोजित ऋषभ कथा एवं महा अर्चना विधान के छठे दिन कथा वाचन करते हुए कहा कि ऋषभदेव को राज दरबार में नीलांजना का नृत्य देखते हुए वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने दिगंबर दीक्षा ग्रहण कर तप करने का निर्णय लिया और अपना राजपाट अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को सौंप दिया। यही भरत छः खंडों के अधिपति बने और उन्हें नौ निधियां और 14 रत्नों की प्राप्ति होने से चक्रवर्ती बने। पढ़िए सचिन गंगावत विशेष रिपोर्ट…


ऋषभदेव। आचार्य पुलक सागर जी महाराज ने भट्टारक यश कीर्ति दिगंबर जैन गुरुकुल में आयोजित ऋषभ कथा एवं महा अर्चना विधान के छठे दिन कथा वाचन करते हुए कहा कि ऋषभदेव को राज दरबार में नीलांजना का नृत्य देखते हुए वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने दिगंबर दीक्षा ग्रहण कर तप करने का निर्णय लिया और अपना राजपाट अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को सौंप दिया। यही भरत छः खंडों के अधिपति बने और उन्हें नौ निधियां और 14 रत्नों की प्राप्ति होने से चक्रवर्ती बने।

इन्हीं भरत के नाम से इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। आचार्य जी ने आगे बताया कि भगवान ऋषभदेव ने छह माह तक योग निरोध करने के बाद आहार ग्रहण नहीं किया और गांव-गांव, नगर-नगर में भ्रमण किया। कहीं पर भी नवधा भक्ति नहीं मिलने से उन्हें आहार नहीं मिला। जब हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस को पूर्व जन्म का जाति स्मरण हुआ, तो उन्होंने नवधा भक्ति से हस्तिनापुर में आहार प्रदान किया।

इक्षु रस का पान कराया

समाज के अध्यक्ष भूपेंद्र कुमार जैन ने बताया कि भगवान ऋषभदेव के रूप में दिलीप भाणावत ने ऋषभदेव नगर में भ्रमण किया। राजा श्रेयांश के रूप में सेठ राजमल कोठारी परिवार के घर पर पड़गाहन हुआ, जहां उन्होंने नवधा भक्ति पूर्वक गुरुकुल परिसर में पांच आश्चर्य सहित इक्षु रस का आहार देने का पुण्य अर्जित किया। प्रत्येक श्रावक-श्राविकाओं को बलवंत बल्लू परिवार ने इक्षु रस का पान कराया। नगर में हर घर के बाहर रंगोली बनाई गई थी।आचार्य जी ने बताया कि भगवान बाहुबली और भरत के बीच अहिंसक युद्ध हुआ, जिसमें नेत्र युद्ध, जल युद्ध और मल्ल युद्ध शामिल थे।

इस युद्ध में बाहुबली विजयी हुए और उन्होंने दिगंबर दीक्षा प्राप्त कर अपना राजपाट छोड़ दिया। आज का युद्ध पैसा और राजसत्ता के लिए होता है, जिसमें हिंसा होती है, जबकि यह युद्ध अहिंसक था और धर्म युद्ध कहलाता है। इस प्रकार भरत चक्रवर्ती बने, और सांयकाल समवशरण की रचना हुई, जिसमें भगवान की दिव्य ध्वनि गूंज रही थी। इस मौके पर प्रतिष्ठाचार्य पंडित सुधीर मार्तंड ने आचार्य भक्ति कर कथा वाचन का निवेदन किया। इससे पूर्व धनपति कुबेर सुंदरलाल भानावत परिवार द्वारा पद्मावती माता को वस्त्र अर्पण किए गए और प्रसाद वितरित किया गया।

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