मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुत सागर जी महाराज जी का मंगल विहार नांद्रे की ओर चल रहा है। यहां पर मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज फिलहाल विराजित हैं। उनके उनकी धर्मसभा का समाजजन लाभ उठा रहे हैं। दौंड से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…
दौंड (महाराष्ट्र )। मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुत सागर जी महाराज जी का मंगल विहार नांद्रे की ओर चल रहा है। यहां पर मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज फिलहाल विराजित हैं। उनके उनकी धर्मसभा का समाजजन लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने प्रवचन में कहा कि समय परिणमनशील है, काल परिवर्तित होते हैं और धर्म सारथी के रूप में महान पुरुष धर्मस्थ को प्रवाहित करते रहते है। इनकी पुण्य वर्गणाआंे से शिथिल हुआ धर्मरथ गति प्राप्त करता है और अनेकों जीव चल पड़ते हैं भगवत्ता प्राप्त करने के लिए। सम्प्रति मे ऐसे ही महापुरुष आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने आकाश सम धर्म को विस्तार प्रदान किया। गुरुदेव का जन्म मध्यप्रदेश के भिंड जिले के रूर ग्राम में हुआ। यह वही भिंड जिला जिसे कभी डाकुओं के शहर के नाम से जाना जाता था परंतु, जब से आचार्य भगवन का जन्म हुआ। उनकी पुण्य वर्गणाओं के प्रभाव से अब यह शहर साधुआंे की नगरी के नाम से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। इस नगर से अनेकों मुनि, आर्यिका और व्रती बन चुके है। मेरा सौभाग्य रहा जिस ग्राम रूर में जिस परिवार में आचार्य श्री विशुद्धसागर जी का जन्म हुआ उसी घर में मेरा भी जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में कहते है कि पुत के लक्षण पालन में दिख जाते हैं। आचार्य श्री बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के रहे। घर में रहते थे तब ही अल्प आयु में समयसार जैसे महान ग्रंथ का स्वाध्याय करते थे।
70 युवाआंे को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान कर जिनशासन को वर्धमान किया
आचार्य श्री की माता को गुरुजी के जन्म के पहले क्षेत्र वंदना करने के भाव आते थे। स्वप्न में मुनिराज के दर्शन होते थे। यही महान आत्मा के आगमन के शुभ चिन्ह कहलाते हैं। 16 वर्ष कि अल्प आयु में ही गणाचार्य विरागसागर महाराज से दीक्षा धारण कर अध्यात्म के सरोवर में प्रवेश कर ऐसी डुबकी लगाई कि फिर कभी आचार्य श्री ने पीछे नहीं देखा। समयसार, प्रवचनसार जैसे महान ग्रंथों पर भव्य जीवों के लिए देशना प्रदान कर जिनशासन को अध्यात्म सरोवर में डुबकी लगवा दी। स्वयं अध्यात्म योगी विशेषण से सुशोभित हुए। वर्तमान काल में नमोस्तु शासन को जयवंत करते हुए आचार्य श्री ने हजारों युवाओं को धर्म मार्ग पर लगाया। सैकडों को व्रती बनाया और 70 युवाआंे को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान कर जिनशासन को वर्धमान किया। गणाचार्य विराग सागर जी ने अपने 550 शिष्यों को आपकी योग्यता देखकर अपनी समाधि के पूर्व आपको अपना पट्टाचार्य पद नियुक्त किया। यही मंगल भावना आप स्वास्थ्य रहे, आपकी आयु दीर्घ हो, आप ऐसे ही नमोस्तु शासन को जयवंत करें। जिस प्रकार घर की शोभा मां से होती है, उसी प्रकार इस जिनशासन कि शोभा गुरुवर आपसे है।













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