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तीसरे तीर्थकर भगवान संभवनाथ जी का जन्म कल्याणक 5 नवंबर को: तिथि के अनुसार कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को जन्म कल्याणक मनाया जाता है 


जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का जन्म कल्याणक इस वर्ष 5 नवंबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार उनका जन्म कल्याणक कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन आता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का जन्म कल्याणक इस वर्ष 5 नवंबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार उनका जन्म कल्याणक कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन आता है। इंदौर सहित देशभर के दिगंबर जैन तीर्थ स्थलों, अतिशय क्षेत्र तथा सिद्ध क्षेत्र में भगवान संभवनाथ जी के जन्म कल्याणक पर विश्व शांति और वैश्विक सद्भाव के लिए शांतिधारा, अभिषेक, पूजन और अर्घ्य आदि अर्पित करने की धार्मिक विधियां की जाएगी। मंदिरों में जैन समाज के श्रद्धालुजन भक्ति भावना के साथ पूजन-अर्चन कर भगवान का जन्म कल्याणक धूमधाम से मनाया जाएगा। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान संभवनाथ का जन्म कल्याणक कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा (दिगंबर जैन मान्यता के अनुसार) आता है जबकि, श्वेतांबर जैन समाज की मान्यता के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है।

हालांकि कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन भगवान संभवनाथ का जन्म कल्याणक ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2025 में यह पर्व 5 नवंबर, 2025 को मनाया जाएगा। इस दिन कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा की पूर्णिमा है। भगवान संभवनाथ जी का जन्म श्रावस्ती नगरी में माता सुषेणा (सेना) के गर्भ से पिता राजा जितारी (दृढ़राज्य) के घर-आंगन में हुआ था। भगवान का चिन्ह अश्व (घोड़ा) है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। जिसमें भगवान के जन्म से संबंधित कथाओं का श्रवण और वाचन किया जाता है। श्री संभवनाथ भगवान का साधार्मिक भक्ति से तीर्थंकर

माता ने 14 स्वप्न देखे। प्रभु माता के उदर में 9 माह 6 दिन रहे और कार्तिक पूर्णिका के दिन प्रभु का जन्म हुआ। भगवान संभवनाथ जी ने तीर्थंकर रूप में दान की महिमा को अतिश्रेष्ठ बताते हुए जैन धर्म की धर्म ध्वजा को समूचे विश्व में फहराया। भगवान की मंगल देशना से जैन धर्म के अनुयायियों को मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। जिसमें तप, तपस्या, दान और अहिंसा का पालन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आरंभ करने का संदेश भी मिलता है।

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