मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव अपने आपको श्रेष्ठ बनाता चाहता है। आदर्श बनाना चाहता है परंतु चाहने से नहीं होता है। आपको यदि श्रेष्ठता की वांछा है तो श्रेष्ठों की संगती, उनका संपर्क करना पडेगा और उनके प्रति अपने आपको समर्पित करना होगा। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…
नांद्रे (महाराष्ट्र )। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज जी यहां भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर विराजमान हैं। मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव अपने आपको श्रेष्ठ बनाता चाहता है। आदर्श बनाना चाहता है परंतु चाहने से नहीं होता है। आपको यदि श्रेष्ठता की वांछा है तो श्रेष्ठों की संगती, उनका संपर्क करना पडेगा और उनके प्रति अपने आपको समर्पित करना होगा। श्रेष्ठता का आधार गुण होते हैं और गुण ही गुरुता को प्रदान करते हैं। अपने को गुरु बनाने के लिए गुरु को सहारा बनाना पडता है। गुरु हमारी कमियों को निकालकर हमें गुनों से पूर्ण करते हैं। अनुशासन में बांधकर हमारी अमर्यादित क्रियाओं को अमर्यादित विचारों को अमर्यादित वचनों को मर्यादित करते हैं। गुणी पुरुष सदा मर्यादित रहता है और वह सबके कल्याण कि भावना अपने हृदय में बनाये रखता है।
वह कभी किसी का अहित नहीं चाहता है, चाहे शत्रु हो, चाहे अशत्रु हो, वह सबके प्रति साम्य भाव रखता है। यह सब महान गुण एक श्रेष्ठ गुणी गुरु की संगती से मिलते हैं। गुरू असमर्थ पुरुषों की छिपी हुए सामर्थ्य को अपने योग के बल पर प्रगट करते हैं। गुरु शिष्य कि अदृश्य शक्ति को दृष्यमान करके जगत का आदर्श अपने शिष्य को बना देता है। इसलिए जीवन में गुरु होना आवश्यक है, जो आपको गुणों से भरकर के आपको गुरुता के पद को प्राप्त कराए।













Add Comment