जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनि सुव्रतनाथ जी का मोक्ष कल्याणक दिगंबर जैन मंदिरों में 14 फरवरी को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण कांड का पाठ, निर्वाण लाडू समर्पण और अर्घ्य आदि दिए जाने के धार्मिक विधान पारंपरिक विधियों के अनुसार किए जाएंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनि सुव्रतनाथ जी का मोक्ष कल्याणक दिगंबर जैन मंदिरों में 14 फरवरी को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण कांड का पाठ, निर्वाण लाडू समर्पण और अर्घ्य आदि दिए जाने के धार्मिक विधान पारंपरिक विधियों के अनुसार किए जाएंगे। इस दिन मंदिरों में भगवान सुव्रतनाथ जी की विशेष पूजा और अर्चना के साथ गुरु भक्ति के महाआरती आदि के कार्यक्रम भी किए जाएंगे। जैन धर्म के ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार मुनि सुव्रतनाथ जी का जन्म कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को राजगृही में हुआ था। प्रभु के पिता का नाम सुमित्र तथा माता का नाम पद्मावती था। प्रभु के शरीर का वर्ण श्याम तथा उनका प्रतीक चिन्ह कछुआ था। प्रभु का जन्म हरिवंश में हुआ था। प्रभु अरिष्टनेमी जी और प्रभु मुनिसुव्रतनाथ जी का वर्णन हरिवंश पुराण में विस्तार के साथ किया गया है। ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान की आयु 30 हजार वर्ष थी। प्रभु सुव्रतनाथ जी ने वैशाख कृष्ण दशमी को दीक्ष्ज्ञा ग्रहण की और दीक्षा के समय प्रभु को मनः पर्व ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे चार ज्ञान के धारक बन गए। उनकी साधनाकाल की अवधि 11 माह की थी और इसके बाद वैशाख कृष्ण नवमी को मुनि सुव्रतनाथ को निर्मल कैवल्य ज्ञान की प्राप्त हुई। प्रभु सर्वज्ञ, जिन, केवली और अरिहंत प्रभु हागए। प्रभु ने चारघाती कर्मों का नाशकर परम दुर्लभ कैवल्य ज्ञान को प्राप्त किया।
इसके बाद उन्होंने चार तीर्थों की स्थापना की और स्वयं तीर्थंकर कहलाए। उनका संघ विस्तारित था। संघ में गणधरों की संख्या 18 थी। मुनि सुव्रतनाथ जी ने सम्मेदशिखर जी में फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन निर्वाण को प्राप्त किया। प्रभु के मोक्ष के साथ ही उन्होंने अष्ट कर्मों का क्षय कर सिद्ध हो गए। भगवान का मोक्ष कल्याणक शिखर जी में निरजर कूट पर हुआ था। वे रात के पिछले प्रहर और श्रवण नक्षत्र में 1 हजार मुनिराजों के साथ सिद्ध लोक में विराजित हुए थे। इस कूट से 99 कोड़ा-कोड़ी 97 करोड़ 9 लाख 999 मुनि सिद्ध हुए।













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