जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 फरवरी को महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। श्री दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ हर्ष और उल्लास के साथ भगवान का यह कल्याणक फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह खबर…
इंदौर। जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 फरवरी को महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। श्री दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ हर्ष और उल्लास के साथ भगवान का यह कल्याणक फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर सभी दिगंबर जैन जिनालयों में भक्तजन श्रद्धा और आस्था के रंग में सराबोर होकर पूजा-अर्चना के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अरहनाथ जी के जयकारों से वातावरण भक्ति मय होगा। इस अवसर पर सभी श्रावक-श्राविकाएं भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण आदि करते हैं।
इस बारे में जैन विद्वानों का मत है कि भगवान की पूजा, भक्ति, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाओं का प्रभाव मन वचन काया पर पड़ता है और जीवन का विकास धन से नहीं धर्म से होता है। इस अवसर पर कई मंदिरों में भक्तजन भक्तामर विधान पाठ कर भगवान की आराधना करते हैं। प्रभावना पूर्वक की गई आराधना से मन में अपार शांति का अनुभव होता है। भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक के बारे जैन धर्मग्रंथों में वर्णित है कि भगवान अरहनाथ ने हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के गर्भ में फाल्गुन शुक्ल तृतीया को प्रवेश किया था। वे जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर, 7वें चक्रवर्ती और 13वें कामदेव थे। उनका प्रतीक चिन्ह मछली है।











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