जो आत्मा को पावन करे, जो आत्मा को पवित्र करे, जो आत्मा को सुखी करे, निर्मल करे वही धर्म है। उक्त उदगार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने गोपाचल पर्वत, ग्वालियर में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…
ग्वालियर। सम्पूर्ण भारत वर्ष में तमिलनाडु हो या कर्नाटक, बिहार हो या पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश हो या राजस्थान जैन संस्कृति का इतिहास कण-कण बोल रहा है। आर्यिका दीक्षा लेने के बाद 30 वर्षो में जितना भ्रमण किया, उसमें जो देखा नदी के किनारे, पहाड़ों की ऊचाइयां, नदी तालाव की गहराइयां, जंगल की बीहड़ता सब कुछ जैन संस्कृति का इतिहास कह रही हैं। जिसने भी जैन धर्म की प्राचीनता को समझा और देखा, इसके इतिहास को देखा, इसके सिद्धान्तों को समझा वह दिल से जैन धर्म को स्वीकार करता है। जैन कोई जाति नहीं हैं, जैन तो धर्म है। धर्म तो आत्मा का विषय है। जो आत्मा को पावन करे, जो आत्मा को पवित्र करे, जो आत्मा को सुखी करे, निर्मल करे वही धर्म है। उक्त उदगार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने गोपाचल पर्वत, ग्वालियर में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए।

जैन धर्म में करते हैं गुणों को नमन
पूज्य गुरुमां आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने बताया कि जैन धर्म में किसी व्यक्ति विशेष की पूजा या उपासना नहीं की जाती। जैन धर्म में किसी व्यक्ति विशेष को नमन नहीं किया जाता। जैन धर्म में व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि उसके गुणों को नमन किया जाता है। जैन धर्म को किसी ने नहीं बनाया, यह तो अनादिकाल से है। आप भारतवर्ष में जहां भी देखेंगे, आपको जैन संस्कृति की झलक, जैन संस्कृति का इतिहास, जैन धर्म की प्राचीनता दिखाई देगी। आप ग्वालियर के गोपाचल पर्वत को ही देख लो, देखने वाला जैन संस्कृति, वैभव और जैन धर्म के इतिहास से परिचित हो जाएगा। आप कहीं भी देखना जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों में एकरूपता दिखाई देगी। सभी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों में कहीं कोई अंतर दिखाई नहीं देगा। सभी की एक ही मुद्रा दिखाई देगी, वह है ध्यान मुद्रा। ध्यान मुद्रा स्वयं के अंदर आत्मा के एकाग्रता को दर्शाती है। हमें अपनी संस्कृति का इतिहास लिखना है। जिसे आने वाली पीढ़ी पढ़ और समझ सके। हमें अपनी संस्कृति को सहेजकर रखना हैं। हमें जो विरासत में मिला है उसे संभाल लो, उसकी सुरक्षा और संरक्षण करा लो, यही बहुत बड़ी बात है। पहले के समय में लोग सुख के प्रति इतने जागरूक नहीं थे, जितने की आज हैं। वर्तमान में लोग पहनने, खाने-पीने के प्रति जागरूक हो गए हैं और अपना अधिकांश समय इसी में व्यतीत करते हैं।













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