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मंदिर दीपक के समान प्रकाशमान होते हैं और तीर्थक्षेत्र सूरज के समान: बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत रहे जैन श्रावक


मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने बुधवार को कटनी के बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में धर्मसभा कर आध्यात्मिक चेतना से जैन श्रद्धालुओं को ओतप्रोत कर दिया। धर्म, संयम,नियम और भक्ति भाव से भगवान की आराधना के लिए उपस्थित जनसमुदाय को प्रेरित भी करते रहे। मुनिश्री के प्रवचनों में तत्वार्थ की बातों से श्रद्धालु गदगद हैं। पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर…


कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने बुधवार को बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में कहा कि धर्म आत्मा का स्वभाव होकर भी हम स्वभाव का आनंद नहीं ले पा रहे हैं, आम मीठा होकर भी व्यक्ति को मीठे का स्वाद नहीं आ पाता और कई बार स्वाद आता है लेकिन, वह खा नहीं पाता। हमारी आत्मा अनादि काल से त्रिकालिक है लेकिन, कभी हमें उस असाधारण गुण की अनुभूति नहीं हुई। सामान्य गुण की अनुभूति तो हमें होती है और सामान्य गुण का अर्थ होता है। अपने अस्तित्व की पहचान, अपने अस्तित्व की अनुभूति। मैं देख रहा हूं। सुन रहा हूं। मैं बोल रहा हूं। मैं चलता-फिरता हूं ये सबके अनुभव में है। चींटी, कीड़े मकोड़े को भी ये ज्ञान है लेकिन, जो कार्य सबमें विद्यमान हो, वे कार्य हमारी कोई उपलब्धि नहीं है। हमारा कुछ विशेषण बनना चाहिए, हम बिना विशेषण के जी रहे हैं। हमारी पहचान अस्तिरूप में है, हमारी पहचान किसी ऐसे रूप में नही है, जो अन्य में नहीं पाया जाए।

हमें भी दुनिया का बनना होगा

वह मिथ्या हो जाता है जब व्यक्ति अपने जीवन की कोई असाधारण पहचान नहीं बना पाता, धर्म एक ही बात पूछता है तुम्हारे पास ऐसा क्या है जो दुनिया के पास नहीं है, जिसे दुनिया चाहती है। हमारा दुनिया साथ देती है, ये कोई बहादुरी नहीं है लेकिन, हम दुनिया का साथ देते हैं, ये बहादुरी है। यदि दुनिया को अपना बनाना है तो हमें भी दुनिया का बनना होगा, दुनिया हमें अपना मान लेगी लेकिन, हमें भी दुनिया को अपना मानना होगा। जो लोग ऐसे हो जाते हैं। उन्हीं को तीर्थंकर, उन्हीं को भगवान कहते हैं। किनके बनते हैं तीर्थ, किनके बनते हैं मंदिर, किनकी होती है पूजा, जिन्होंने दुनिया के लिए कुछ किया हो, जो दुनिया के लिए जिये हो। भगवान के पास जो कुछ होता है, वह सारे जगत का होता है।

अपने पुण्य को साधु भोगता नहीं

पेड़ कहता है कि मेरी छाया मेरे काम नहीं आएगी, इसका मुझे गम नहीं है लेकिन, मेरी छाया जगत के काम आएगी, इसकी खुशी मुझे है, इसी का नाम है महापुरुष। संसार में सबसे ज्यादा पुण्य का उदय साधु का होता है, तीन लोक में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो महाराज के पुण्य की बराबरी कर सके, बस साधु की विशेषता एक है, अपने पुण्य को भोगता नहीं, उसे भोगने का भाव नहीं आता, भोगना पड़े तो मजबूरी है कि मेरा पुण्य मेरे काम क्यों आ गया, ये खेद साधु को होता है। पुण्य के कारण से कई चीजों की उपलब्ध होती है तो उसे खुशी नहीं होती, वह खेद नहीं करेगा तो उदासीन रहेगा। उनके फल को भोगने में साधु उदासीन हो जाए तो समझना साधना में अतिशय होने वाला है और पुण्य के उदय को ठुकरा दे तो समझना वह साधु से भगवान बनने वाला है।

सिद्धालय में बैठने से भगवान को आनंद है

उस कार्य को करो जिससे तुम्हें लाभ न हो, जगत को लाभ हो, वह पुण्य धर्म कहलाता है। जिस क्रिया में स्वयं का लाभ या स्वार्थ निहित हो, महानुभाव! वो धर्म की कोटि में नही आता क्योंकि, सभी संसारी प्राणी अपने लिए करते है। जब कोई भी धर्म की क्रिया करने में तुम्हें यह भाव आ जाए कि इस क्रिया से मुझे यह लाभ है, यहाँ मेरा यश और प्रसिद्धि बढ़ेगी तो वहां वह धर्म नहीं, वह तो सभी करते हैं लेकिन इसको थोड़ा सा परिवर्तित कर दो, वह धर्म की कोटि में आ जायेगा जहां तुम्हारा स्वार्थ नहीं है, लेकिन तुम्हारे धर्म करने से जगत के स्वार्थ की सिद्धि हो जाएगी। सिद्धालय में बैठने से भगवान को आनंद है लेकिन मंदिरों में बैठने से भगवान को किंचित मात्र भी आनंद नहीं है फिर भी साक्षात तीर्थंकर से ज्यादा अतिशय व शक्ति मंदिर में बैठे भगवान में होती है क्योंकि मंदिर में जब भी भगवान बैठेगा, वह स्वयं के लिए नहीं, सारे जगत के लिए बैठेगा।

तीर्थ क्षेत्र को कभी सीमित मत रखना

तीर्थक्षेत्र क्यों बनते हैं? इसका मूल उद्देश्य होता है- तीर्थांे में वो ताकत होती है, जो एक तक सीमित नहीं, असीम हो जाते है। तीर्थ क्षेत्र को कभी सीमित मत रखना क्योंकि यह सूर्य के समान होते हैं। दीपक उतने ही कमरे प्रकाश देता है जितने में जलाया है लेकिन सूरज पूर्व में उगता है लेकिन प्रकाश सारे जगत को देता है। मंदिर दीपक के समान है और तीर्थक्षेत्र सूरज के समान प्रकाशमान होते है। बस तुम्हारे मन में ये भाव आ जाये कि कोई मुझे लाभ दें या हानि दंे, मैं सदा उसको सुखी ही देखना चाहूंगा तो धर्म आ गया, ये तीर्थक्षेत्र ऐसे ही होते है।

एक धर्मात्मा धर्म से कैसे ऊब गया,

कॉलोनी में मंदिर बनाते हो तो अपने लिए बनाते हो वो तो मजबूरी है लेकिन, जब तीर्थ में कोई मंदिर बनाओ तो वह अपने लिए नहीं, सारे जगत के लिए होता है, ये है दान। तीर्थ पर दिया गया दान सूरज के समान चमकता है, इसलिए जब तुम्हें तीर्थ पर कुछ करने का या तीर्थ बनाने का या तीर्थ का उद्धार मौका मिले तो चूकना मत। पापी कभी पाप से नहीं ऊबता है, रागी राग से, शराबी शराब से, गुटखा वाला गुटखा खाने से नहीं ऊबता है फिर एक धर्मात्मा धर्म से कैसे ऊब गया, ये समझ में नही आता है। धर्म करने के बाद तुम्हे थकान हो जाए तो समझना तुमने धर्म किया ही नहीं है, तुमने मजबूरी में किया है तो मजदूरी मिलेगी। मोह, राग या स्वार्थ में धर्म किया है तो व्यापार किया है। खेत में बीज बोने के सामान आदि धन फलता है तो वह दान कहलाएगा।

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