अच्छे गार्जियन यह चाहते हैं कि उनका अधीनस्थ व्यक्ति स्वयं अपने पैरों पर खड़ा हो, अपने निर्णय खुद लें। यह कला हमें अपने अंदर अवश्य विकसित करनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, घर के एक विशेष कमरे में महिलाओं के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं। वहां अशुद्ध महिलाएं रहती हैं और तीन दिन तक मौन रहती हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
सागर। अच्छे गार्जियन यह चाहते हैं कि उनका अधीनस्थ व्यक्ति स्वयं अपने पैरों पर खड़ा हो, अपने निर्णय खुद लें। यह कला हमें अपने अंदर अवश्य विकसित करनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, घर के एक विशेष कमरे में महिलाओं के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं। वहां अशुद्ध महिलाएं रहती हैं और तीन दिन तक मौन रहती हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार, भोजन भी वे मिट्टी के बर्तनों में करती हैं और इसे बाद में फेंक देती हैं। अग्नि से सारी चीजें शुद्ध हो जाती हैं, लेकिन उस अवस्था में भोजन करने वाले का बर्तन अग्नि से भी शुद्ध नहीं होता।
उपवास रखे
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि तीन दिन तक उपवास रखें, पानी भी न पीएं, भोजन भी न करें। अगर शक्ति नहीं है तो रूखा भोजन जैसे कांजी, छाछ आदि खाकर तीन दिन व्यतीत करें। इस दौरान किसी से भी बातचीत न करें। यह व्यवस्थाएं पहले थीं। संयुक्त परिवारों में लोग इस पाप से बच जाते थे, लेकिन एकल परिवारों में यह समस्या बढ़ गई है। आजकल महिलाएं अशुद्धि में भोजन बना रही हैं और घर का काम कर रही हैं, क्योंकि घर में कोई अन्य सदस्य नहीं है। संयुक्त परिवारों की कमी से यह समस्या उत्पन्न हुई है। इसके समाधान के रूप में मैंने यह सुझाव दिया कि समाज को मंदिरों के साथ भोजनालय खोलने चाहिए, ताकि जब किसी जैन परिवार में महिला अशुद्ध अवस्था में हो, तो वहां से टिफिन भेजने की व्यवस्था की जा सके।
अपशगुन को समझें
उन्होंने कहा कि यदि मुनि महाराज को स्वयं का रक्त चार अंगुल से अधिक दिख जाए तो वे केवल उसे देखकर ही अंतराय कर देते हैं। प्राकृतिक प्रक्रिया होने का मतलब यह नहीं है कि हम व्यवस्थाएं तोड़ दें, हमें इनकी व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए। कम से कम ऐसी महिलाओं का आप स्पर्श तो न करें, लेकिन आजकल महिलाएं शॉपिंग करने और शादियों में जाने लगी हैं। एक अशुद्ध महिला का किसी शुभ कार्य में शामिल होना उस परिवार के लिए बहुत बड़ा अपशगुन है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, यह सबसे बड़ा अपशगुन है। जिस घर की महिलाएं शुद्धि और अशुद्धि का ध्यान नहीं रखतीं, वही घर नीच कुल में माना जाता है। ऐसे घर की महिलाएं अगर शादी में जाती हैं, भोजन बनाती हैं या अन्य कार्य करती हैं, तो वह घर सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जाता। आप जैन होकर भी नीच कुल के माने जाएंगे, क्योंकि ऐसे घरों से पुण्य की कोई प्राप्ति नहीं होती।
भोजन बनाना महत्वपूर्ण कला
उन्होंने कहा कि पुरुषों के लिए भी 72 कला में एक महत्वपूर्ण कला भोजन बनाना है। यह कला उन्हें इसलिए सीखनी चाहिए, क्योंकि एक दिन ऐसा आ सकता है जब घर के अपशगुन को बचाने के लिए पुरुषों को भी भोजन बनाना पड़े। यदि पुरुष भोजन बनाना सीखते हैं तो वे इस पाप से बच सकते हैं। सच्चे जैन के लिए घर के सभी कार्य करना आवश्यक है। एक सच्ची जैन महिला तो शादी से पहले यह पूछेगी कि ‘क्या तुम रोटी बनाना जानते हो?’ क्योंकि एक माँ का हाथ का पानी भी अगर अशुद्ध हो, तो वह बच्चे की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है। 8 साल की उम्र से पहले बच्चों को शूद्र माना जाता था, क्योंकि उस उम्र तक वह अपनी माँ से अलग नहीं हो सकते। जब तक माँ के साथ रहते हैं, तब तक उनके साथ ही रहते हैं। इस समय बच्चों को शुद्ध भोजन देना महत्वपूर्ण है।
धार्मिक क्रियाएं सफल करें
उन्होंने कहा कि मां को यह समझाना चाहिए कि ‘मैं तुम्हारी मां हूं, लेकिन मैं स्त्री हूं, और स्त्री का नैतिक कर्तव्य है कि वह तुम्हें अहित न पहुंचाए। इसलिए तुम्हें रोटी बनाना सिखाना चाहिए।’ यदि बेटे को यह सिखाया जाए तो वह किसी भी अशुद्ध अवस्था में अपनी मां के हाथ का भोजन नहीं करेगा, और उसकी सारी धार्मिक क्रियाएं सफल रहेंगी। अशुद्ध अवस्था में पति या बेटे को भोजन कराना परिवार की दुर्गति का कारण बन सकता है। एक बार के भोजन से पूरे छह महीने का पुण्य नष्ट हो सकता है। डॉक्टर भी यह मानते हैं कि इस समय रिएक्शन होने की संभावना रहती है। “बेटे को व्यापार करना, मंदिर आना, महाराज को आहार देना सिखाओ या न सिखाओ, लेकिन रोटी बनाना जरूर सिखा देना। पानी भरना, घर में झाड़ू लगाना, कपड़े धोना सिखाओ। जब माँ और पत्नी स्वस्थ रहते हुए बेटा चूल्हे पर रोटी बनाए, तो यही तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा आशीर्वाद होगा।”













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