ललितपुर में पर्युषण पर्व के दौरान आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि तप आत्मा को निर्मल बनाता है और इन्द्रियों पर विजय ही सबसे बड़ी साधना है। नगर के विभिन्न जैन मंदिरों में पूजा-अर्चना, धार्मिक प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
ललितपुर। तपाने से जैसे अशुद्ध वस्तु शुद्ध होती है उसी तरह अपनी आत्मा को तप के माध्यम से तपाते हैं तो जीवन में निखार एवं परिणामों में निर्मलता आती है। यह विचार वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज ने पर्युषण पर्व के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इच्छाओं का निरोध भी तप है। ध्यान और स्वाध्याय के द्वारा इन्द्रिय विषयों तथा कषायों का निग्रह करना ही सच्चा तप है। आचार्य श्री ने कहा कि इन्द्रिय विषयों पर विजय पाना ही सबसे बड़ी साधना है।
भक्तों ने प्रभु अभिषेक और शान्तिधारा की
श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में आयोजित धर्मसभा का शुभारम्भ दीपप्रज्जवलन से हुआ। तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन हुआ तथा प्रातःकाल आचार्य श्री ने साधना और धर्म से जीवन को जोड़ने की प्रेरणा दी। अभिनंदनोदय तीर्थ में मुनि सुदक्त सागर एवं मुनि पदमदत्त सागर महाराज के सान्निध्य में भक्तों ने प्रभु अभिषेक और शान्तिधारा की।
संध्या कालीन कार्यक्रमों में सुधाकलश महिला मंडल ने आचार्य श्री के जीवन पर आधारित नृत्यनाटिका प्रस्तुत की। वहीं पाठशाला के बच्चों ने उत्साहपूर्वक प्रतियोगिताओं में भाग लिया। पार्श्वनाथ अटा मंदिर में अंताक्षरी प्रतियोगिता भी आयोजित हुई।

इस जगहों पर हुए आयोजन
नगर के प्रमुख जैन मंदिरों – अभिनंदनोदय तीर्थ, अटा मंदिर, आदिनाथ बड़ा मंदिर, पार्श्वनाथ नया मंदिर, चंद्रप्रभु मंदिर डोडाघाट, शांति नगर मंदिर, गांधीनगर आदि में भक्तों ने प्रातःकालीन अभिषेक, पूजा और वंदना की।इस अवसर पर ब्रह्मचारिणी लवली दीदी ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि तप धर्म की महिमा को केवल पूजा या जयकार तक सीमित न रखकर उसे जीवन में अपनाना चाहिए।













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