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गुरु चरण शरण से कष्ट विपत्ति कम होती है: आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने दीक्षा पूर्व दीक्षार्थियों को दिए मंगल आशीर्वचन 


आचार्य श्री वर्धमानसागर जी, गणनी आर्यिका श्री सरस्वती मति, गणनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में संघ सहित विराजित हैं। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि मोक्षमार्ग ,वैराग्य, संयम से सभी प्राणी घबराते हैं उन्हें कठिन लगता है। पदमपुरा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


पदमपुरा। आचार्य श्री वर्धमानसागर जी, गणनी आर्यिका श्री सरस्वती मति, गणनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में संघ सहित विराजित हैं। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि मोक्षमार्ग ,वैराग्य, संयम से सभी प्राणी घबराते हैं उन्हें कठिन लगता है। पहाड़ दूर से बहुत कठिन लगता है किंतु निकट जाने पर जो चलना प्रारंभ करता है, उसका रास्ता सरल और आसान हो जाता है। उन्होंने कहा कि उसी प्रकार मोक्ष मार्ग भी आसान है। सम्यक दर्शन, सम्यकज्ञान ,सम्यक चारित्र ,धर्म से राह सरल और आसान हो जाती है। तब मोक्ष रूपी फल मिलता है। धर्म रूपी बीज को गुरु चरणों में अर्चना निष्ठा समर्पण से सिंचित करते रहना चाहिए। दोनों दीक्षार्थियों ने आज गणघर वलय विधान में गणधरों की रिद्धियां की अर्चना भक्ति कर अर्घ समर्पित किए हैं। देव शास्त्र गुरु की चरण शरण से राह आसान हो जाती है। जिन सुकुमाल मुनि को बिस्तर पर सरसों का दाना भी चुभता था। उन्होंने भी दीक्षा ली है। आज सभी अनुमोदना करने के लिए एकत्र हुए है।

तीन वलय वाले गणधर विधान में 48 अर्घ्य किए समर्पित 

अनुमोदना करने के साथ दीक्षा भी लेना चाहिए। घर हो या संयम साधु जीवन हो कर्मों के कारण कष्ट और विपत्ति रोग आते हैं। भगवान की भक्ति से सब रोग कष्ट पीड़ा दूर होती है। दीक्षार्थी लादूराम जी भी आचार्य श्री धर्मसागर जी के समय से संघ परंपरा से जुड़े हैं। गुरुचरण से शरण मिलती है। भावना भव नाशिनी होती है। भावना और भव से दुख दूर होते हैं। यह मंगल धर्म देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने दीक्षा पूर्व दीक्षार्थियों द्वारा किए गए गणधर विधान के पूजन के अवसर पर प्रकट की। पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा श्री ब्रह्मचारी लादूराम जी और बालब्रह्मचारी सत्यम भैय्या के केशलोचन बाद मस्तक और हाथों पर दीक्षा संस्कार कर जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की जाएगी। तीन वलय वाले गणधर विधान में प्रथम वलय में आठ ,दूसरे में 16 और तीसरे वलय में 24 कुल 48 अर्घ्य समर्पित किए गए। इसके बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पूजन किया गया।

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