वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के...
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रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य...
बिना गुरु के आत्मोन्नति भी सम्भव नहीं है। गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता।...








