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आप अपने पुण्य वैभव को बीज बना रहे हैं या राख : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने पुण्य कर्म की समग्र व्याख्या की  

संसारी जीवों के पास दो प्रकार का वैभव पाया जाता है। पहला बाहरी धन-वैभव और दूसरा आत्मा का अंतरंग गुण धन। बाहरी धन वैभव पुष्य कर्म के अधीन है जो सदैव घटता-बढ़ता...

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